जोकीहाट प्रखंड के अधिकांश गांवों में कभी बड़े पैमाने पर होने वाली पटुआ (जूट) की खेती अब धीरे-धीरे सिमटती जा रही है। करीब दो दशक पहले तक क्षेत्र में पटुआ की खेती किसानों के लिए आमदनी का प्रमुख जरिया मानी जाती थी, लेकिन अब किसान पटुआ की जगह मक्का की खेती को अधिक तरजीह दे रहे हैं।किसानों के अनुसार पटुआ की खेती में अधिक मेहनत के साथ-साथ पानी की समस्या भी बनी रहती है। पटुआ की कटाई के बाद इसे पानी में सड़ाने की प्रक्रिया करनी पड़ती है। इसके लिए पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है, लेकिन नदी, गड्ढे और तालाबों की संख्या पहले की तुलना में कम होने से किसानों को परेशानी होती है।बौरिया चौक स्थित एक गड्ढे में पटुआ की निराई-गुड़ाई कर रहे किसानों ने बताया कि पहले इलाके में काफी मात्रा में पटुआ की खेती होती थी। अब अधिक मेहनत और बढ़ती लागत के कारण किसान इस फसल से दूरी बना रहे हैं। किसानों ने बताया कि निराई-गुड़ाई में करीब 500 रुपये तथा अन्य खर्च भी आता है, जिससे खेती की लागत बढ़ जाती है।पटुआ से प्राप्त रेशे का उपयोग बोरे, दरी, रस्सी और कागज समेत कई उत्पाद बनाने में किया जाता है। कम लागत में बेहतर आमदनी की संभावना के कारण इसे कभी लाभदायक फसल माना जाता था। हालांकि उचित खाद, सिंचाई और जल-निकासी की व्यवस्था के अभाव में किसानों के सामने कई चुनौतियां हैं।
किसानों के मुताबिक पटुआ की फसल में मिट्टी जनित बीमारी, खासकर सड़न की समस्या भी सामने आती है। वहीं बाजार में प्लास्टिक उत्पादों के बढ़ते प्रभाव से पटुआ से बने उत्पादों की मांग प्रभावित हुई है। प्राकृतिक आपदा, कीट प्रकोप और मौसम में बदलाव भी फसल को नुकसान पहुंचाते हैं।
इसके बावजूद बाजार में पटुआ से बने बोरे, रस्सी, दरी और झोले की मांग बनी हुई है। किसानों का कहना है कि यदि पटुआ की खेती के लिए सिंचाई, जल-निकासी, उचित खाद और बेहतर बाजार व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए तो इस पारंपरिक फसल को फिर से बढ़ावा मिल सकता है।



















