नजरिया न्यूज़ पटना।
पूर्णिया जिले में संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 22 अप्रैल, 2026 को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना में हाइब्रिड माध्यम से संयुक्त समन्वय टीम की बैठक आयोजित की गई। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य पूर्णिया जिले में डीएपी उर्वरक के अत्यधिक एवं असंतुलित उपयोग की समस्या पर था, जिसे देश के शीर्ष 100 डीएपी उपभोग करने वाले जिलों में शामिल किया गया है। बैठक की अध्यक्षता संस्थान के निदेशक डॉ. अनुप दास ने की तथा इसमें कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान, पटना के निदेशक डॉ. अंजनी कुमार विशेष रूप से उपस्थित रहे। बैठक में कृषि विज्ञान केंद्र, पूर्णिया, जिला कृषि विभाग, तथा भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय, पूर्णिया से प्रतिभागियों ने भाग लिया।
बैठक के दौरान विशेषज्ञों ने संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न रणनीतियों पर विस्तृत चर्चा की, जिसमें समेकित पोषक तत्व प्रबंधन, हरी खाद, ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती, जैव उर्वरकों का उपयोग आदि शामिल हैं। किसानों की क्षमता वृद्धि हेतु प्रशिक्षण एवं कार्यशालाओं के माध्यम से कौशल विकास कार्यक्रम संचालित करने का निर्णय लिया गया। इसके अंतर्गत फसल प्रणाली में हरी खाद/दलहनी फसलों पर 100 प्रत्यक्षण तथा जैव उर्वरकों पर 100 प्रत्यक्षण आयोजित करने की योजना बनाई गई।
हालांकि, विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि अब एक जैसी (सभी जगह लागू होने वाली) उर्वरक अनुशंसाओं को छोड़कर मृदा परीक्षण के आधार पर और स्थान विशेष के अनुसार उर्वरक प्रबंधन अपनाना जरूरी है, ताकि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार सही मात्रा में पोषक तत्व दिए जा सकें।
साथ ही, उर्वरकों के बेहतर उपयोग के लिए नैनो उर्वरक और तरल पोषक तत्व जैसे नए विकल्प अपनाने पर भी जोर दिया गया, जिससे डीएपी जैसे पारंपरिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो सके। अपने उद्बोधन में डॉ. अनुप दास ने कहा कि उर्वरकों का युक्तिसंगत उपयोग न केवल किसानों की लागत को कम करने में सहायक है, बल्कि दीर्घकाल में मृदा उर्वरता एवं पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पूर्णिया जिले में गेहूं से मक्का एवं मखाना की खेती की ओर हो रहे बदलाव को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने फसल-विशिष्ट पोषक तत्व प्रबंधन अनुसूचियों के पुनरीक्षण की आवश्यकता बताई, ताकि उर्वरकों का अधिकतम दक्षता के साथ उपयोग सुनिश्चित किया जा सके। साथ ही, जलीय वातावरण में मखाना की बढ़ती खेती के संदर्भ में वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन विकसित करने पर भी जोर दिया गया, जिससे अनियंत्रित उर्वरक उपयोग को रोका जा सके एवं जल गुणवत्ता की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन, किसान प्रशिक्षण कार्यक्रमों एवं व्यापक जन-जागरूकता अभियानों के माध्यम से संतुलित उर्वरक उपयोग के आर्थिक एवं पर्यावरणीय लाभों का प्रचार-प्रसार किया जाएगा। विचार-विमर्श के दौरान यह सामने आया कि पूर्णिया जिले में डीएपी की अत्यधिक खपत के कारण पोषक तत्वों का असंतुलित उपयोग हो रहा है, जिससे मृदा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, उर्वरक उपयोग दक्षता घट रही है तथा दीर्घकालिक कृषि स्थिरता के लिए जोखिम उत्पन्न हो रहे हैं। प्रतिभागियों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि पूर्णिया जिले में संतुलित उर्वरक उपयोग के राष्ट्रीय अभियान के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए अनुसंधान संस्थानों, प्रसार एजेंसियों एवं संबंधित विभागों के बीच समन्वित कार्ययोजना अपनाई जाएगी।
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