- कानून को आईना: बिना जांच ‘सेम डेट’ में FIR क्यों? बथनाहा पुलिस की जल्दबाजी पर उठे सवाल, क्या SP करेंगे कार्रवाई?
- अररिया कोर्ट द्वारा पत्रकार पर दर्ज केस खारिज होने के बाद बथनाहा थाना की कार्यशैली पर गंभीर कानूनी सवाल खड़े हो गए हैं। कानून के जानकारों का पूछना है कि बिना किसी प्रारंभिक जांच के, आवेदन मिलते ही ‘सेम डेट’ में इतनी अंधी जल्दबाजी के साथ FIR क्यों दर्ज की गई? क्या बिना तहकीकात किसी बेकसूर के घर रात-रात भर रेड डालकर उसे प्रताड़ित करना न्यायसंगत है? आखिर इस जल्दबाजी का असली मकसद क्या था?
- अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पुलिस अधीक्षक (SP) इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार थाना प्रभारी पर कड़ा एक्शन लेंगे और झूठा मुकदमा करने वाले पर कार्रवाई होगी?
नजरिया न्यूज़, अररिया (बिहार)।
चौथे स्तंभ पर हमले और पत्रकारों को डराकर सच की आवाज दबाने की साजिशों के बीच अररिया न्यायपालिका से न्याय की एक बड़ी नजीर सामने आई है। अररिया की एक माननीय अदालत ने बथनाहा थाना क्षेत्र के एक पत्रकार के खिलाफ दर्ज कराए गए कथित अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (नृशंसता निवारण) अधिनियम यानी SC/ST एक्ट के तहत दर्ज मुकदमे को पूरी तरह खारिज (Dismiss) कर दिया है।
अदालत का यह फैसला न केवल पीड़ित पत्रकार के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, बल्कि दुर्भावना और साजिश के तहत झूठे मुकदमों में फंसाने वाले तत्वों के मुंह पर भी एक करारा तमाचा है।
*क्या था पूरा मामला और पुलिसिया जांच?*
मामले की पृष्ठभूमि में जाएं तो बथनाहा थाना कांड संख्या 104/2024 (विशेष SC/ST केस संख्या 50/2025) के तहत पत्रकार साधन यादव (उम्र 45 वर्ष, पिता: स्व. रामजी यादव, ग्राम: श्यामनगर, वार्ड नं. 13, थाना: बथनाहा) को मुख्य आरोपी बनाते हुए शिकायत दर्ज कराई गई थी।
शिकायतकर्ता घनश्याम कुमार राम (ग्राम: छोटी मस्जिद वार्ड नं. 14, थाना: जोगबनी) ने आरोप लगाया था कि नौकरी दिलवाने के नाम पर पैसे की हेराफेरी की गई और पैसे मांगने पर जातिसूचक गालियां (चमरवा, दूधवा) देते हुए आंगन में न घुसने व जान से मारने की धमकी दी गई। बथनाहा थाना प्रभारी भानु प्रताप गुप्ता ने मामला दर्ज कर जांच की जिम्मेदारी विशेष शाखा के सब-इंस्पेक्टर (S.I.) परवेज आलम खान को सौंपी थी।
*पुलिस जांच में खुली पोल: दर्ज हुई ‘फाइनल रिपोर्ट’*
घटना की गहन जांच के बाद पुलिस के अनुसंधान अधिकारी (I.O.) ने पाया कि पत्रकार के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह मनगढ़ंत, झूठे और बेबुनियाद थे। पुलिस ने इस मामले में सच्चाई को सामने लाते हुए न्यायालय के समक्ष ‘फाइनल रिपोर्ट’ (Final Report) दाखिल की, जिसमें आरोपी पत्रकार को निर्दोष बताया गया।
*माननीय न्यायालय का सख्त रुख और आदेश*
मामला ‘In the Court of 1st Addl. Sessions Cum Spl. (SC/ST) Judge, Araria’ की अदालत में पहुंचा। माननीय न्यायालय ने नैसर्गिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों का पालन करते हुए शिकायतकर्ता (Informant) को अपना पक्ष रखने के कई मौके दिए।
29 मई 2025: कोर्ट द्वारा सर्विस रिपोर्ट संलग्न की गई।
30 जून 2025: न्यायालय ने शिकायतकर्ता को पुलिस की फाइनल रिपोर्ट पर अपनी बात रखने का ‘अंतिम मौका’ (Last Chance) दिया था।
25 अगस्त 2025 (फैसले का दिन): बार-बार समन और बुलावे के बावजूद शिकायतकर्ता न्यायालय में उपस्थित नहीं हुआ। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट लिखा:
“आज बार-बार बुलाए जाने पर भी कोई उपस्थित नहीं हुआ, अतः जांच अधिकारी (I.O.) द्वारा प्रस्तुत फाइनल रिपोर्ट को स्वीकार किया जाता है और मामले को खारिज (Dismissed) किया जाता है।”
*महीनों का मानसिक उत्पीड़न: रात-रात भर पुलिस की रेड*
न्यायालय से राहत मिलने के बाद पीड़ित पत्रकार ने अपना दर्द बयां करते हुए साथियों से नम्र निवेदन किया और इस आदेश पर विचार करने की अपील की। पत्रकार ने बताया कि किस तरह इस झूठे मुकदमे की आड़ में उन्हें और उनके परिवार को कई महीनों तक मानसिक और सामाजिक रूप से प्रताड़ित किया गया।
स्थानीय पुलिस के द्वारा पत्रकार को परेशान करने के लिए कई बार रात-रात भर उनके घर पर छापेमारी (रेड) की गई, जिससे उनका सामाजिक सम्मान धूमिल करने की कोशिश हुई। पत्रकार ने सवाल उठाया है कि आखिर एक सोची-समझी साज़िश के तहत उन्हें इस तरह के गंभीर और संवेदनशील मामले में क्यों फंसाया गया? इसके पीछे कौन से तत्व काम कर रहे थे, इसकी भी जांच होनी चाहिए।
*नजरिया न्यूज का दृष्टिकोण: अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रहार क्यों?*
यह मामला इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे कुछ रसूखदार या निहित स्वार्थ वाले लोग अपनी कमियों को छुपाने या पत्रकारों की निष्पक्ष आवाज को दबाने के लिए SC/ST जैसे कड़े और संवेदनशील कानूनों का दुरुपयोग ‘हथियार’ के रूप में करने की कोशिश करते हैं।
अररिया कोर्ट का यह फैसला उन सभी कलमकारों के लिए एक संबल है, जो हर रोज धरातल पर सच को उजागर करने के लिए जूझते हैं। न्यायालय के इस ऐतिहासिक कदम से यह साबित हो गया है कि न्याय में देरी भले हो सकती है, लेकिन अंधेर नहीं। कानून का दुरुपयोग करने वालों पर भी अब नकेल कसना जरूरी हो गया है ताकि भविष्य में किसी निर्दोष और चौथे स्तंभ के प्रहरी को ऐसे मानसिक संताप से न गुजरना पड़े।





















