सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड को पहचान पत्र के रूप में मान्यता न देने को लेकर चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल उठाया है
अगर वोटर लिस्ट में किसी शख्स का नाम सिर्फ देश की
नागरिकता साबित होने के आधार पर शामिल करेंगे तो फिर ये बड़ी कसौटी होगी: सुप्रीम कोर्ट
जयकृष्ण पांडेय, विधि संवाददाता नजरिया न्यूज, 11जुलाई।
मतदाता सूची की गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया पर सुनवाई शुरू हो है। इस पर कोर्ट ने कहा कि अगर वोटर लिस्ट में किसी शख्स का नाम सिर्फ देश की नागरिकता साबित होने के आधार पर शामिल करेंगे तो फिर ये बड़ी कसौटी होगी। यह गृह मंत्रालय का काम है, आप उसमें मत जाइए। उसकी अपनी एक न्यायिक प्रक्रिया है, फिर आपकी इस कवायद का कोई औचित्य नहीं रहेगा…
सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड को पहचान पत्र के रूप में मान्यता न देने को लेकर चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल उठाया है। आयोग के वकील ने जवाब देते हुए कहा कि सिर्फ आधार कार्ड से नागरिकता साबित नहीं होता।
इस पर कोर्ट ने कहा कि अगर वोटर लिस्ट में किसी शख्स का नाम सिर्फ देश की नागरिकता साबित होने के आधार पर शामिल करेंगे तो फिर ये बड़ी कसौटी होगी। यह गृह मंत्रालय का काम है, आप उसमें मत जाइए। उसकी अपनी एक न्यायिक प्रक्रिया है, फिर आपकी इस कवायद का कोई औचित्य नहीं रहेगा।
विपक्षी दलों के प्रमुख सवाल:
चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि आरपी एक्ट में भी नागरिकता का प्रावधान है। इस पर कोर्ट ने कहा कि आपको अगर यह करना है तो फिर इतनी देरी क्यों की। यह चुनाव से ठीक पहले नहीं होना चाहिए।
गौरतलब है कि विपक्षी दलों और ADR की ओर से दायर की गई याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया था। इन याचिकाओं में पांच बड़े सवाल उठाए गए हैं:
पहला सवाल:- संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन
विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि चुनाव आयोग का यह फैसला जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 और रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल 1960 के नियम 21A के साथ ही संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 325 और 326 का भी उल्लंघन है।
दूसरा सवाल:- नागरिकता, जन्म और निवास पर मनमानी।
एक्टिविस्ट अरशद अजमल और रूपेश कुमार की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि यह प्रक्रिया नागरिकता, जन्म और निवास से संबंधित असंगत दस्तावेजीकरण लागू करने की मनमानी है।
तीसरा सवाल:- लोकतांत्रिक सिद्धांत कमजोर करने वाला फैसला।सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में चुनाव आयोग के वोटर वेरिफिकेशन के फैसले को लोकतांत्रिक सिद्धांतों को कमजोर करने वाला बताया गया है।
चौथा सवाल:- गरीबों पर असमान बोझ।सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में यह भी कहा गया है कि चुनाव आयोग की यह प्रक्रिया गरीब, प्रवासी के साथ ही महिलाओं और हाशिए पर पड़े अन्य समूहों पर असमान बोझ डालने वाली है।
पांचवां सवाल:- गलत समय पर शुरू की गई प्रक्रिया।राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की ओर से दायर की गई याचिका में आरोप लगाया गया है कि ये प्रक्रिया गलत टाइम पर शुरू की गई है। मनोज झा ने कहा कि यह प्रक्रिया जल्दबाजी में गलत समय पर शुरू की गई है, जिसकी वजह से करोड़ों वोटर मताधिकार से वंचित हो जाएंगे।
चुनाव आयोग का बयान
विपक्षी दलों द्वारा लगाए गए आरोपों को लेकर चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि जिन लोगों के नाम 1 जनवरी, 2003 को जारी की गई वोटर लिस्ट में हैं, उन्हें कोई दस्तावेज देने की जरूरत नहीं होगी।
चुनाव आयोग ने बताया कि वे सभी लोग संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत प्राथमिक तौर पर भारत के नागरिक माने जाएंगे। जिन लोगों के माता-पिता के नाम तब की मतदाता सूची में दर्ज है, उनको केवल अपनी जन्मतिथि और जन्मस्थान से संबंधित दस्तावेज देने होंगे।
याचिकाकर्ताओं में एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव ने कहा कि एक जुलाई को मतदाता सूची का ड्राफ्ट जारी करने की जानकारी सुप्रीम कोर्ट को चुनाव आयोग ने दी है। इससे पहले 28जुलाई को मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट करेगा। सुप्रीम कोर्ट के कई सवालों का जवाब आज चुनाव आयोग देने में असमर्थ रहा। आधार कार्ड और, राशनकार्ड और वोटर आई कार्ड को भी मुख्य दस्तावेजों में शामिल करने का सुप्रीम का सुझाव भी मतदाताओं को बड़ी राहत देने वाला रहा है।






















