सबसे अधिक संकट हाथियों पर अन्य जंगली जानवरों की जान भी आफत में:- सुरेश शर्मा
नजरिया। भरगामा।
कोसी सीमांचल व पश्चिमांचल जल, जंगल व जानवर के लिए सदियों से मशहूर माने जाते हैं। जंगल है, तो जानवरों का उसमें रहना स्वाभाविक है पर, हकीकत कुछ और है जिस तरह से जंगलों की कटाई हो रही है, जंगल की जमीन का अवैध रूप से अतिक्रमण कर मानवीय बस्ती के साथ ही अन्य संरचना निर्माण हो रहा है, जो जंगली जानवरों के लिए खतरे की घंटी है।
पर्यावरण अभियंता वृक्ष मानव सुरेश शर्मा बताते हैं कि इससे जंगलों में रहने वाले जानवरों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। जानवर जंगल छोडने को विवश होने लगे हैं। यही वजह है कि आए दिन जंगली जानवरों व आम आदमी के बीच द्वंद होने के मामले भी सामने आ रहे हैं। इसमें मानव व जानवर दोनों को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ रहा है। वास्तविकता यह है कि इंसानों ने जंगल को अपनाना शुरू किया है और पारंपरिक वाशिंदे जानवर जंगल छोड़ कर बस्ती की ओर भाग रहे हैं। इस हिंसक द्वंद में दोनों को हानि पहुंच रही है। उत्तर बंगाल व अररिया जिले व पश्चिमांचल से सटे जिले के परिदृश्य में देखा जाए, तो इन जिले के ज्यादातर भाग जंगलों से घिरे हुए हैं। पूर्व में भारत नेपाल सीमा पर मेची नदी है,तो पश्चिम मे बारा जिले मे निजगढ जंगल बहुल क्षेत्र से गुजरी है। लेकिन विकास के नाम पर जंगल की कटाई होने से इससे जंगल का कई भागों में विभाजन हो गया। सुरेश शर्मा बताते है कि जंगलों के अतिक्रमण से प्रभावित तो सभी तरह के जानवर हुए, लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित कोई जानवर हुआ, तो वह है हाथी। ऐसे अन्य जंगली जानवरों की जान भी आफत में है।
रिहायशी क्षेत्र में क्यों आते हैं हाथी:-
उन्होंने कहा कि हाथी टेरिटोरियल एनिमल की श्रेणी में नहीं, बल्कि माइग्रेटियर श्रेणी में आते हैं। यानी हाथियों को एक सीमित दायरे में घेर कर नहीं रखा जा सकता है। जब एक जंगल से दूसरे जंगल के बीच गांव स्थापित करने के अलावा रास्ते बना दिए गए, खेती होने लगी, ग्रामीण इलाकों के लोग अपने गाय व भैंस समेत अन्य पालतू पशुओं को जंगलों में चारा के लिए ले जाने लगे, जंगलों के फल-फूल पर अतिक्रमण करने लगे, जिसे जंगली जानवर खाया करते थे, तब इन सब वजहों से जंगलों में हाथियों समेत अन्य जानवरों को दिक्कतें होने लगीं। हाथी स्वभाव के मुताबिक एक जगह नहीं रह सकते। अपने खाने-पीने व अन्य जरूरतों की पूर्ति के लिए एक जंगल से दूसरे जंगल में जाने के लिए हाथी निकलने लगे। मक्का व धान हाथी के प्रिय व स्वादिष्ट खाद्य सामग्री हैं। रास्ते में इस तरह की फसल मिलने के बाद हाथियों को समझ में आता था कि यह उनके लिए ही है और उसे खाने लगते थे।
यहीं से मानव व हाथी के बीच द्वंद की शुरुआत हुई। हाथियों द्वारा लोगों के घर तोड़ देना, फसल क्षतिग्रस्त कर देना आए दिन की घटना हो गई। लोग पटाखे व बंदूक की गोली दाग कर हाथियों का तांडव रोकने का प्रयास करने लगे। इसमें कभी हाथियों के हमले में नागरिकों की मौत हो जाती है, तो कभी लोगों द्वारा बंदूक अथवा अन्य तरीकों से किए जाने वाले हमले से हाथियों की मौत हो जाती है। यही वजह है कि पूरे देश में सबसे ज्यादा मानव-हाथी द्वंद इन्हीं क्षेत्रों में होता है। मानव-हाथी द्वंद में हर साल औसतन 10 हाथी व 50 मनुष्यों की मौत हो जाती है।
रोकना होगा जंगल की कटाई:-
निजगढ काठमांडू फास्ट ट्रैक के निर्माण मे भी हजारो पेड़ की कटाई हो गयी वहीं अब इसके लिए निर्माण किए जाने वाले टोल प्लाजा के लिए सौ वर्ष से भी पुरानी भीम सखुवा के पेड़ काटने की तैयारी है जिससे पर्यावरण पर निश्चित रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा श्री शर्मा बताते हैं की पर्यावरण संरक्षण व पेड़ पौधे किसी एक देश की विरासत नही होती इसके कटने से विश्वव्यापी प्रभाव पड़ता है इसके लिए संरक्षण के लिए सभी को आगे आना होगा।






















