– होली से पहले चंद्र ग्रहण का साया, सूतक काल ने बदला होलिका दहन का समय
– दोपहर एक बजे से शाम 06:46 बजे ग्रहण की समाप्ति तक मंदिर रहेगा बंद
– सूतक काल के दौरान किसी भी प्रकार की पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठान रहेगा बंद
नजरिया न्यूज़, अररिया।
होली के जश्न के लिए शहर से लेकर गांवों तक तैयारी होने लगी है।रंगों के त्योहार होली को लेकर बाजारों में दुकानें सज गई हैं।हिंदू धर्म में होलिका दहन का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, लेकिन इस साल 3 मार्च 2026 को होलिका दहन पर भद्रा और चंद्र ग्रहण का एक साथ होना चिंता का विषय बना हुआ है।इस कारण दो मार्च को होलिका दहन और तीन मार्च को होली त्योहार बनाया जायेगा।बताया जाता है कि भद्रा काल और ग्रहण का सूतक काल दोनों ही समय किसी भी मांगलिक या शुभ कार्य के लिए वर्जित माने जाते हैं। इस कारण दोपहर एक बजे से शाम 06:46 बजे ग्रहण की समाप्ति तक सभी मंदिर बंद रहेगा।सूतक काल के दौरान किसी भी प्रकार की पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठान रहेगा बंद रहेगा। मां खड्गेश्वरी महाकाली मंदिर के साधक नानु बाबा ने बताया कि सूतक काल और चंद्र ग्रहण का प्रभाव भारतीय के समय के अनुसार, तीन मार्च को चंद्र ग्रहण का प्रभाव शाम 06:26 बजे चंद्रोदय के साथ ही दिखने लगेगा और यह शाम 06:46 बजे समाप्त होगा। हालांकि, ग्रहण की विभिन्न अवस्थाएं दोपहर 02:16 बजे से ही शुरू हो जाएंगी, लेकिन सूतक काल का विशेष महत्व होता है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सूतक काल दोपहर एक बजे से ही प्रारंभ हो जाएगा, जो शाम 06:46 बजे ग्रहण की समाप्ति तक रहेगा। सूतक काल के दौरान किसी भी प्रकार की पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठान की मनाही होती है, इसलिए होलिका दहन दो मार्च और होली चार मार्च को बनाया जायेगा।
ग्रहण समाप्त होने के बाद पूरे घर में गंगाजल का करे छिड़काव
भद्रा और सूतक के दोष से बचने के लिए सहजता के साथ कुछ नियमों का पालन करना चाहिए। ग्रहण काल के दौरान ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का निरंतर मानसिक जाप करते रहें, जिससे वातावरण की नकारात्मकता का आप पर प्रभाव न पड़े। शाम को ग्रहण समाप्त होने के बाद पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करें और फिर शुद्ध मुहूर्त में होलिका पूजन करें।होलिका की अग्नि में अनाज और नारियल अर्पित करना घर में सुख-शांति लाता है। माना जाता है कि इन नियमों का पालन करने से किसी भी प्रकार के ग्रहों की उग्रता शांत होती है और घर के संचालन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं।
होली का क्या है महत्व
मां खड्गेश्वरी महाकाली मंदिर के साधक नानु बाबा ने बताया कि होलिका दहन को लेकर कइ प्रकार की मान्यताएं व शास्त्रोक्ति है। एक मान्यता है कि प्रह्लाद को जलाने के लिये जब हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया तो होलिका प्रह्लाद को लेकर अपने साथ वरदान में मिले कंबल लेकर आग में बैठ गयी। पर देव कृपा से हवा चली और कंबल प्रह्लाद के उपर आ गया।परिणाम हुआ कि होलिका जल कर भष्म हो गयी, और प्रह्लाद बच गये। उसी दिन से होलिका दहन की प्रथा है। दूसरी प्रथा बताते बताते हैं कि हिमालय पुत्री माता पार्वती ने शिव की तपस्या भंग करने की योजना बनाई।इसके लिये माता पार्वती ने कामदेव की सहायता ली।कामदेव ने प्रेमवाण चलाकर भगवान शिव की तपस्या भंग कर दी। इस बात से शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। क्रोध से उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी। उनके इस क्रोध की ज्वाला में कामदेव का शरीर भस्म हो गया। यहां प्रेमवाण ने अपना असर दिखाया।तब शिवजी को माता पार्वती को देखते ही उनमें प्रेम जागृत हो गया। और उन्हें अपनी पत्नी रूप में स्वीकार कर लिया। कामदेव के भस्म को प्रेम का प्रतीक मानकर इस पर्व को मनाया जाने लगा। बाबा ने कहा कि होली प्रेम का पर्व है।इसे प्रेम भाव से मिलजुल कर मनाया जाना चाहिए। इस पर्व में शपथ लेना चाहिए कि अपने माता पिता की सेवा करें। इससे लोगों को सभी कष्टों का निवारण होगा।






















