गुजरात विधानसभा द्वारा पारित कारखाना (गुजरात संशोधन) विधेयक, 2025 अब राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत है। लेकिन श्रमिक संगठनों, संवैधानिक विशेषज्ञों और नागरिक समाज ने इसे श्रमिकों के अधिकारों और अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानकों के प्रतिकूल बताते हुए राष्ट्रपति से अनुच्छेद 213 के अंतर्गत इसे मंज़ूरी न देने की अपील की है।
इस विधेयक के तहत कार्यस्थल पर श्रमिकों की परिस्थितियों में बड़े बदलाव का प्रस्ताव है। इसमें सबसे अहम प्रावधान हैं—दैनिक कार्य समय को 9 घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे करना, बिना विश्राम लगातार 6 घंटे काम करने की अनुमति देना, ओवरटाइम सीमा का विस्तार करना और महिलाओं को रात्रिकालीन पाली में काम की अनुमति देना। विशेषज्ञों का कहना है कि ये बदलाव “आर्थिक लचीलेपन” के नाम पर श्रमिकों की सुरक्षा और अधिकारों को कमजोर करेंगे।
संवैधानिक दृष्टि से यह विधेयक कई प्रश्न खड़े करता है। अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में “सम्मानजनक आजीविका” भी शामिल है, और 12 घंटे का कार्यदिवस इस अधिकार को चोट पहुँचाता है। अनुच्छेद 23 जबरन श्रम पर रोक लगाता है, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर श्रमिकों के लिए “लिखित सहमति” अक्सर बाध्यता का रूप ले सकती है। वहीं अनुच्छेद 14 के तहत समानता का अधिकार भी प्रभावित होगा क्योंकि कारखाना श्रमिकों के साथ अन्य श्रमिकों से अलग व्यवहार किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले भी इस विधेयक के खिलाफ खड़े होते हैं। उदाहरण के लिए, ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम (1985) में आजीविका के अधिकार को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना गया। इसी तरह विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) में कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा को सर्वोच्च महत्व दिया गया था, जबकि प्रस्तावित संशोधन रात्री पाली में महिलाओं को असुरक्षित परिस्थितियों में धकेल सकते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के मानक भी इस विधेयक से टकराते हैं। ILO का कन्वेंशन नंबर 1 कार्य दिवस को 8 घंटे और सप्ताह को 48 घंटे तक सीमित करने की बात करता है। कन्वेंशन नंबर 29 जबरन श्रम के विरुद्ध है, जबकि कन्वेंशन नंबर 190 कार्यस्थल पर हिंसा और उत्पीड़न से सुरक्षा सुनिश्चित करता है। भारत भले ही सभी सम्मेलनों का पक्षकार न हो, लेकिन बार-बार उसने वैश्विक मंचों पर श्रमिकों के अधिकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई है।
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी गंभीर हो सकते हैं। श्रमिकों की थकान और लंबे कार्य घंटे न केवल उत्पादकता घटाएँगे बल्कि औद्योगिक दुर्घटनाओं की संभावना भी बढ़ाएँगे। महिलाओं की रात्री पाली से उत्पीड़न और शोषण का खतरा भी बढ़ जाएगा। निरीक्षण तंत्र को मजबूत किए बिना सारी ज़िम्मेदारी नियोक्ताओं पर डालना इस कानून को अव्यावहारिक बना देगा।
संगठनों ने राष्ट्रपति से अपील की है कि वे इस विधेयक को मंजूरी न दें और श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा व्यापक परामर्श और समीक्षा कराई जाए। यह न केवल भारत के श्रमिकों की गरिमा और स्वास्थ्य की रक्षा करेगा बल्कि संविधान और अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों के अनुरूप भी होगा।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आर्थिक विकास की दौड़ में क्या श्रमिकों की सुरक्षा और अधिकारों को दरकिनार किया जा सकता है?




















