=उद्योग को सुरक्षा चाहिए- फसल को सुरक्षा चाहिए, किसान और उद्योगपति असुरक्षित
= उद्योगपतियों का उद्योग से और किसानों का खेती से असुरक्षा के चलते मोह भंगा होता जा रहा है
दुर्केश सिंह, संपादकीय प्रभारी नजरिया न्यूज, 25जुलाई।
लोकसभा चुनावों ने ये साफ़ कर दिया था कि रोज़गार का मुद्दा निर्णायक साबित होगा। 2024का बजट में इसकी चिंता झलकती है लेकिन उद्योग और फसल की सुरक्षा के लिए कारगर व्यवस्था नहीं की गई है। नीलगाय, सुअर और संरक्षित पशुओं के भय से आलू, मक्का, अरहर, मटर, चना की खेती किसानी नहीं कर रहे हैं। टाप 1 के उद्योगपतियों के भय से अन्य उद्योगपतियों का मोह कल-कारखाने लगाने में नहीं रह गई है। यह जानकारी देते हुए वरिष्ठ पत्रकार कपिल देव सिंह कहते हैं:
मोदी सरकार अपने पहले कार्यकाल से ही हर साल दो करोड़ रोज़गार देने का वादा करती आई थी लेकिन ये कभी पूरा नहीं हो पाया।
विश्लेषकों का मानना है कि नोटबंदी, जीएसटी की खामियों और कोविड से पैदा दिक्क़तों की वजह से सरकार का ये वादा धरा का धरा रह गया। यथार्थ इससे परे है। बड़े उद्योगपतियों के भय से छोटे उद्योगपतियों का मोह कल-कारखाने से भंग हो गया है।
सवाल ये है कि इस बार रोज़गार को लेकर जो एलान किए गए हैं वो बेरोज़गारी को दूर करने में कितना कामयाब हो पाएंगे।
भारत में रोजगार की स्थिति पर बारीक नज़र रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है देश में नौकरियां बढ़ाने के लिए बड़े बुनियादी क़दम उठाने होंगे।
नौकरियां बढ़ाने के लिए बजट में जो एलान किए गए हैं, उनके मुताबिक़ पहली बार नौकरी हासिल करने वाले कर्मचारियों को एक महीने की सैलरी सरकार उनके बैंक खाते में ट्रांसफर करेगी। यानी इससे उन्हें नौकरी देने वाली कंपनियों पर भार कम पड़ेगा। इससे वो नौकरियां देने के लिए प्रोत्साहित होंगी। यह अनुमान दिवा सपना साबित होगा। फर्जी नौकरी के नाम पर वेतन खारिज हो जाएगा। मनरेगा में ऐसा हो रहा है। कागज में रोजगार का सृजन हो रहा है। अधिकारी और मनरेगा कर्मियों में 70 प्रतिशत राशि का खेल खेला जा रहा है।
फिलहाल आम बजट में नई नौकरी पाने वाले को राशि तीन किस्तों में ट्रांसफर की जाएगी जो अधिकतम 15,000 रुपये तक होगी। इस स्कीम से फायदा 30 लाख युवाओं को मिलने का अनुमान है।
आर्थिक मामलों की वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सिंह ने बातचीत में कहा कि सिर्फ़ इन्सेन्टिव देने से रोज़गार नहीं बढ़ेंगे।
उन्होंने कहा,”कोविड के बाद अर्थव्यवस्था में रिकवरी और रोज़गार बढ़ाने के लिए उद्योगों को ख़ासा टैक्स इन्सेन्टिव दिया गया था ताकि वो लोगों को नौकरियां दें. लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उद्योगों का उद्योगपतियों ने विस्तार नहीं किया। क्योंकि कोविड और उसके बाद देश में मांग काफ़ी कम हो गई थी।उद्योगों को लगा कि उनका निवेश फंस जाएगा। इसलिए फ़िलहाल पैसा न लगाया जाए. ऐसे में रोज़गार कहां से बढ़ता।





















