दुर्केश सिंह, संपादकीय प्रभारी, नजरिया न्यूज, 15फरवरी।
इलेक्टोरल बॉन्ड को सुप्रीम कोर्ट ने आज असंवैधानिक ठहराते हुए रद कर दिया। 2019में बिहार में राजद और विपक्ष का आंदोलन चल रहा था। मुद्दा था, संविधान खतरे में है।
उसी समय इलेक्ट्रोल बॉड को लेकर इसके ज़रिए राजनीतिक पार्टिर्यों को मिलने वाले चंदे पर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि वो इस तरह की फंडिंग के ख़िलाफ़ नहीं है पर चंदा देने वाले शख़्स की पहचान अज्ञात रहने के ख़िलाफ़ है।
चुनाव आयोग के नरमी भरे बर्ताव पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि आपने मई 2017 में केंद्र को लिखी अपनी चिट्ठी में इलेक्टोरल बॉन्ड से जुड़े नियमों को ‘पीछे ले जाने वाला क़दम’ बताया था।क्या आपने अपना पक्ष बदल लिया है?
मई 2017 में आयोग ने एक चिट्ठी लिखी थी जिसके मुताबिक़ चुनाव आयोग ने राजनीतिक पार्टिर्यों को दिए जाने वाले चंदे को सार्वजनिक ना करने पर आपत्ति दर्ज की थी।
केंद्र सरकार का तर्क है कि वह चंदा देने वाले व्यक्ति की पहचान को लेकर गोपनीयता रखना चाहती है।
राजनीतिक दलों को मिला चंदा:
2019 में भारत में इलेक्टोरल बॉन्ड पर विमर्श का विषय था, यह इसलिए लाए गए ताकि सियासी चंदे में काले धन के लेन-देन का ख़ात्मा करके, राजनीतिक दलों के रक़म जुटाने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जा सके।
हालांकि उस समय आलोचकों का कहना था:
इलेक्टोरल बॉन्ड का असर इसके उलट हुआ है।बॉन्ड के ज़रिए चंदे पर रहस्य का पर्दा पड़ा हुआ है।
पहली बात तो ये है कि इस बात का कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड नहीं है कि प्रत्येक बॉन्ड को किसने ख़रीदा और उसे किसे दान दिया गया।
एडीआर का कहना है कि इस वजह से इलेक्टोरल बॉन्ड ‘असंवैधानिक और अवैध’ हो जाते हैं क्योंकि देश के करदाताओं को दान के स्रोत की जानकारी ही नहीं होती है।
इसके अलावा, आलोचक कहते थे :
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इलेक्टोरल बॉन्ड पूरी तरह से अनाम भी नहीं होते क्योंकि सरकारी बैंकों के पास इस बात का पूरा रिकॉर्ड होता है कि बॉन्ड किसने ख़रीदा और किस पार्टी को दान में दिया। ऐसे में सत्ताधारी पार्टी बड़ी आसानी से ये जानकारी जुटा सकती है और फिर इसका ‘इस्तेमाल’ दान देने वालों को प्रभावित कर सकता है। एडीआर के सह-संस्थापक जगदीप छोकर कहते हैं कि, ‘इस तरह से इलेक्टोरल बॉन्ड, सत्ताधारी पार्टी को अनुचित फ़ायदा पहुंचाने वाले होते हैं।
राजनीतिक दलों का चंदा: बीजेपी मालामाल, विपक्ष कंगाल:
फोटो –पीएम नरेंद्र मोदी, कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व पीएम मनमोहन सिंह (फ़ाइल तस्वीर)
जब 2017 में पहली बार इलेक्टोरल बॉन्ड लाने का एलान किया गया था तो भारत के चुनाव आयोग ने कहा था कि इससे ‘चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बुरा असर पड़ेगा’।तब रिज़र्व बैंक, क़ानून मंत्रालय और कई सांसदों ने दावा किया था कि इलेक्टोरल बॉन्ड सियासी दलों में काले धन की आमद-ओ-रफ़्त को रोकने में कामयाब नहीं होंगे। (हालांकि, एक साल बाद चुनाव आयोग अपने पुराने रुख़ से पलट गया था और उसने इलेक्टोरल बॉन्ड का समर्थन किया था.)।
उस समय बिहार प्रदेश में राजद के नेता कहते थे:
असल में इलेक्टोरल बॉन्ड के ज़रिए सरकार ने चुनावी चंदे के घाल-मेल को क़ानूनी जामा पहना दिया है।
‘चंदा देने वाले किसी भी रक़म का बॉन्ड ख़रीदकर, सियासी दलों को दे सकते हैं, और कोई भी पक्ष इस लेन-देन को सार्वजनिक करने के लिए बाध्य नहीं है। अगर पर्दे के पीछे किए जाने वाले इस गोपनीय लेन-देन को पारदर्शिता बताकर ढोल पीट रहे हैं तो ज़ाहिर है कि ये तो पारदर्शिता की एकदम नई परिभाषा है, जो अब तक तो नहीं सुनी गई थी।
फिलहाल इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि भारत में राजनीतिक चंदा जुटाने की प्रक्रिया में सुधार लाकर, इसे और पारदर्शी बनाने की ज़रूरत है। भारत में चुनाव लड़ना बहुत महंगा सौदा होता है और इसका ज़्यादातर ख़र्च निजी चंदे से पूरा किया जाता है।
2019 के आम चुनाव के बारे में कहा जाता है कि इसमें 7 अरब डॉलर की रक़म ख़र्च की गई थी जो केवल अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में ख़र्च की गई रक़म से कम है।
भारत में वोटर की तादाद लगातार बढ़ रही है।1952 में हुए पहले आम चुनाव में देश में चार लाख से भी कम मतदाता थे जो 2019 के आम चुनाव में बढ़कर 90 करोड़ से भी ज़्यादा हो गए। वोटर की इतनी बड़ी संख्या तक पहुंच बनाने, उसे अपने हक़ में प्रभावित करने के लिए उम्मीदवारों को ज़्यादा रक़म ख़र्च करनी पड़ती है। भारत में प्रशासन की तीन स्तरीय व्यवस्था- गांव, राज्य और केंद्र- होने का मतलब है कि चुनावों की संख्या भी बढ़ गई है। हर चुनावी मुक़ाबला बेहद कड़ा हो गया है।
सियासी दल, हर साल अपनी आमदनी और ख़र्च का ब्यौरा चुनाव आयोग को देते हैं। उनकी आमदनी का 70 फ़ीसद से ज़्यादा हिस्सा ‘अज्ञात स्रोतों’ से दिखाया जाता है।
एडीआर का कहना है कि इन ‘अज्ञात स्रोतों’ में एक बड़ी हिस्सेदारी इलेक्टोरल बॉन्ड की होती है।
हालांकि देश के अधिकांश मतदाता इन बातों से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते हैं।
मसलन, सामाजिक कार्यकर्ता राम उजागिर ने कहा:
बॉड के पहले राजनीतिक दलों को मिलने वाली लगभग सारी की सारी रक़म नक़दी से भरे सूटकेस की शक्ल में मिलती थी। राजनीतिक दलों को इस तरह चंदा देने वालों में से कई के किरदार तो बेहद दाग़दार होते थे।





















