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जीडीपी में कृषि का योगदान आज 15प्रतिशत है-1990-91में यह योगदान 35प्रतिशत था: पत्रकार आशुतोष, चैनल एडमिन आशुतोष की बात
==किसानों की बाजार का सामना (मार्निंग पावर) की शक्ति न्यूनतम हो गई है…
= इसीसलिए सरकारें किसानों की बातें नहीं सुनती,किसानों को अपनी बात मनवाने के लिए वोट की ताकत दिखानी होगी…
दुर्केश सिंह, संपादकीय प्रभारी, नजरिया न्यूज, 14 फरवरी।
अडानी 1952में भी थे। 1957में भी थे। आज भी अडानी हैं। नीतियां अडानी के हित में बनाई जाती हैं। किसानों को वोट की ताकत दिखानी पड़ेगी। राहुल गांधी ने किसानों की मांग पूरी करने की घोषणा की है। चुनाव के दबाव में आकर प्रधानमंत्री नरेंद्र भी किसानों की मांग स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश, किसानो और मजदूरों की कर्ज माफ करने की सहित सभी मांगों को मांग सकते हैं। किसान और मजदूरों को वोट की ताकत दिखानी होगी। यह बात, पत्रकार आशुतोष के चैनल पर विमर्श के दौरान कही गई है।किसान, भाजपा नेता और पत्रकार विमर्श में शामिल थे। किसानों की समस्याओं पर पूर्व गवर्नर सत्यपाल मलिक ने भी कहा, अडानी के दबाव में एम एमएसपी की मांग को खारिज किया जा रहा है।
आंदोलन की उम्र शांति के साथ जुड़ी होती है, पूरे विश्व में किसान आंदोलन कर रहे हैं केवल भारत में शांतिपूर्ण आंदोलन को रोक जा रहा है। मीडिया से सरकारें नहीं बदलती हैं। सब लोग सब समझते हैं, मीडिया का कोई असर नहीं होगा। यह विमर्श सोशल मीडिया का है।
प्रो.महेश कुमार:
रोटी देने से कोई वोट नहीं देता। अपनी बिरादरी, इलाके और इश्यू पर लोग वोट देते हैं।10फरवरी को 17वीं लोकसभा का अंतिम सत्र समाप्त हो गया। किसानों की मांगों को नहीं माना गया। 13फरवरी को किसान दिल्ली कूच कर रहे हैं।आम रास्ते को उपयोग करने का अधिकार किसानों को भी है। दिल्ली भाजपा की नहीं है। दिल्ली से 200किमी पहले हरियाणा में में किसानों को रोक रोक देना अलोकतांत्रिक कदम है। इसका दुष्परिणाम सरकार को भुगतना होगा। हरियाणा हाईकोर्ट ने भी किसानों को दिल्ली जाने से रोकने के प्रयास को अलोकतांत्रिक कदम बताया है।
खेती छोड़ने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है।
विनोद अग्निहोत्री:
किसानों की मांगों को नहीं मानने वाली पूर्व की सरकारों ने दिल्ली आने से कभी नहीं रोका। राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे, उन्होंने किसानों को मनाकर धरनास्थल में बदलाव करवाए थे। सांसद में कृषि मंत्री ने बताया कि किसानों की मांगों को लेकर 33बैठकें हो चुकी हैं। उन 33बैठकौं में क्या हुआ, यह सरकार ने नहीं बता रही है। किसानों के बैठने, रहने की व्यवस्था दिल्ली में सरकार करती। सभी किसानों के समक्ष वार्ता होतीं। किसानों को वार्ता के माध्यम से संतुष्ट किया जाता। घमंड करना भाजपा के पदाधिकारियों के सेहत के लिए ठीक नहीं है।
बीजेपी नेता अरविंद ने इसका खंडन करते हुए कहा :मेरा कहने का मतलब है, भाजपा के खिलाफ नैरेटिव सेट किया जा रहा है जबकि हम किसानों के विषय में सोच रहे हैं।
चौधरी पुष्पेन्द्र सिंह ने कहा:
एमएसपी की मांग जायज है। लागत पर 50प्रतिशत बेनिफिट जोड़कर कृषि उत्पाद का मूल्य तय करने की मांग को एमएसपी कहते हैं। किसानों की मांग है कि एमएसपी से कम मूल्य पर कोई भी कृषि उत्पाद को नहीं खरीदे, यह मांग किसानों की है।
सरकार को केवल कानून बनाना है। व्यापारियों की लूट जारी रहे। इसलिए सरकार किसानों की मांग नहीं मान रही है।
नरेश सिरोही ने कहा:
सरकार बिना एक पैसा खर्च किए इस कानून को बना सकती है। जो अर्थशास्त्री कहते हैं कि इस कानून को बनाने के लिए 17लाख करोड़ रुपये चाहिए, उन्हें अर्थशास्त्र का कुछ भी पता नहीं है।हर सात वर्ष बाद किसानों की आमदनी अन्य उत्पाद के मुकाबले आधी रह जाती है।यह भारत सरकार का डाकूमेंट कहता है। हम नहीं कह रहे हैं। 1970में 76रुपये क्विंटल गेहूं का रेट था। 12ग्राम सोने का मूल्य सवा दो सौ रुपये था। हर साल किसानों के उत्पाद का मूल्य साढ़े 12परसेंट कम हो जाता ता है। आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है।
चौधरी पुष्पेन्द्र ने कहा:
इस देश को कार्पोरेट चलाते हैं।सारी नीतियां कार्पोरेट को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। कार्पोरेट के लोगों से सुझाव लिया जाता है। यह आज भी हो रहा है। पैबंद लगाने से किसानों की हालत नहीं सुधरेगी। चौधरी चरण सिंह कहा करते थे किसानों को कृषि उपज का लाभकारी मूल्य चाहिए। कृषि ऐसा व्यवसाय जिसमें लागत निकालनी भी मुश्किल हो जाती है। हम तो आलू की खेती करते हैं। लागत भी निकालना कभी कभी मुश्किल हो जाता है। किसान कोल्ड स्टोरेज में ले जाने के बजाय उन्हें खेत में ही खाद बना देते हैं। किसानों को धान में रखकर कृषि नीति बननी चाहिए।
पूर्व गवर्नर सत्यपाल मालिक ने पत्रकार दीपक शर्मा से बातचीत में उनके चैनल पर कहा:
किसानों की मांग को मान लेने से अडानी को भारी क्षति होगी। इसलिए सरकार, किसानों की मांग को नहीं मान रही है। राहुल गांधी ने सत्ता में आने के बाद किसानों की मांग मान लेने की घोषणा की है। राहुल गांधी को कोई पद नहीं चाहिए।यह उनकी सबसे बड़ी ताकत है।
कोट:
जीडीपी कृषि का योगदान आज 15प्रतिशत है।1990-91में यह योगदान 35प्रतिशत था। किसानों की बाजार का सामना (मार्निंग पावर) की शक्ति न्यूनतम हो गई है। इसीलिए सरकारें किसानों की बातें नहीं सुनती। किसानों को अपनी बात मनवाने के लिए वोट की ताकत दिखानी होगी:
आशुतोष, चैनल एडमिन आशुतोष की बात





















