कटिहार जिले की सोशल मीडिया के अनुसार:ऐश्वर्या ने साल 2023 में ही नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 के तहत आवेदन किया, लेकिन कुछ तकनीकी दिक्कतों के चलते आवेदन खारिज़ हो गया।
नवंबर 2024 में उन्होंने फिर से आवेदन किया और फिर 3 जनवरी 2025 को सुमित्रा रानी साहा को भारत की नागरिकता मिल गई।
नागरिकता मिलने से बेहद खुश सुमित्रा रानी साहा अब खुद को अपने पति के नाम से यानी सुमित्रा प्रसाद कहलाना पसंद करती हैं।
वो बताती हैं, “जब पटना से सरकारी फोन आया तो लगा कि क्या कर लें।खुशी के मारे क्या खाएं – क्या पिएं कुछ समझ नहीं आ रहा।अब हमको बस अपने कागज़ का इंतजार है।
अब मेरा भी परमानेंट घर हो गया।मुझे कोई प्रॉपर्टी से निकाल नहीं सकता और कोई भी बांग्लादेशी नहीं कहेगा।
मैं शादी के बाद 40 साल में एक बार भी बांग्लादेश नहीं गई, लेकिन ये सब मुझे बांग्लादेश ही भेजना चाहते थे।
सुमित्रा, भोजपुरी सीख ली है।वो हिंदी, बांग्ला के साथ साथ अब भोजपुरी बोल लेती हैं।क्या बांग्लादेश का कुछ याद आता है?इस सवाल पर कहती हैं: नहीं, कुछ भी नहीं। अब यहीं सब कुछ हो गया।बेटियां हो गईं। इनसे बिछड़ना पड़ता, तो सोचिए क्या हालत होती इस उम्र में?
किशनगंज में बांग्लादेश से आए हिंदुओं ने अपने नाम गोपनीय रखते हुए क्या कहा…
नागरिकता अधिनियम,1955 भारतीय नागरिकता से जुड़ा कानून है।इसमें बताया गया है कि भारतीय नागरिक कौन है और नागरिकता कैसे दी जा सकती है?
इसी कानून में साल 2019 में मोदी सरकार ने सुधार के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक, 2019 (सीएए) लाई। इसके तहत 31 दिसंबर 2014 को या इससे पहले पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान से भारत आए हिंदू, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को नागरिकता मिल पाएगी।
संसद के दोनों सदनों से पास होने के बाद ये कानून 11 मार्च, 2024 को लागू हो गया था।
जिला और राज्यस्तर पर होता है वेरीफिकेशन
सीएए के तहत आए आवेदनों का वैरीफिकेशन दो स्तरों पर होता है-पहला ज़िला स्तर पर और दूसरा राज्य स्तर पर।
ज़िला स्तर पर बनी तीन सदस्यीय समिति के अध्यक्ष संबंधित ज़िले के डाक अधीक्षक होते हैं।आरा के डाक अधीक्षक पवन कुमार वर्मा ने मीडिया से बातचीत में कहते :
हम लोग ज़िला स्तर पर वेरीफाई करते हैं। राज्य स्तर पर इस कमेटी की अध्यक्षता जनगणना निदेशक करते हैं।
बिहार के जनगणना उपनिदेशक पंकज सिन्हा ने मीडिया से कहा: हमारे यहां सुमित्रा रानी साहा का मामला आया था…।
सुमित्रा- पहले भारतीय, फिर बांग्लादेशी और अब भारतीय बनने की कहानी कुछ इस तरह है:
मीडिया के अनुसार सुमित्रा रानी साहा का जन्म कटिहार में हुआ था। उनके माता–पिता कटिहार में ही रहते थे।
पिता मदन गोपाल चौधरी के चार बच्चे थे। मदन गोपाल चौधरी की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी और बांग्लादेश के राजशाही में रहने वाली उनकी बहन रुक्मिणी देवी की कोई औलाद नहीं थी।
राजशाही, भारत-बांग्लादेश की सीमा पर स्थित एक शहर है। बिहार के कटिहार से महज 206 किलोमीटर दूर राजशाही को बड़ा व्यावसायिक और शैक्षणिक केन्द्र माना जाता है।सुमित्रा जब मैं पांच साल की थी, तो बुआ राजशाही ले गई। बुआ ने वहीं पढ़ाया-लिखाया।
“सुमित्रा जब दसवीं में पढ़ रही थी, तो वहां पर हिंदू लड़कियों के साथ अत्याचार हो रहा था।बुआ ने सुमित्रा के पिताजी को फोन करके कहा कि अब मैं इसे नहीं पढ़ाऊंगी और शादी कर दूंगी।
सुमित्रा के पिता ने कहा कि मैं उसकी शादी भारत में ही करूंगा। तब तक सुमित्रा के सारे कागज़ बांग्लादेश के बन गए थे और सुमित्रा भारतीय से बांग्लादेशी नागरिक बन गई थीं।
पिता मदन गोपाल चौधरी की जिद पर बुआ रुक्मिणी ने सुमित्रा का पासपोर्ट बनवाया।
सुमित्रा 27 जनवरी 1985 को अपने मूल घर कटिहार वापस आ गई। 10 मार्च 1985 को उनकी शादी बिहार के भोजपुर (आरा) ज़िले के व्यवसायी परमेश्वर प्रसाद से हो गई।




















