प्रतिभा सिंह, विशेष संवाददाता, नजरिया न्यूज, दिल्ली,27दिसंबर।
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का गुरुवार को 92 साल की उम्र में निधन हो गया।यह जानकारी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली ने मीडिया को दी।
एम्स ने प्रेस रिलीज में बताया कि 92 वर्षीय मनमोहन सिंह को गुरुवार की शाम घर पर “अचानक बेहोश” होने के बाद गंभीर हालत में एम्स के आपातकालीन विभाग लाया गया था।
मनमोहन सिंह लगातार दो बार भारत के प्रधानमंत्री रहे और उनकी व्यक्तिगत छवि काफी साफ-सुथरी रही।
भारत में आर्थिक सुधारों का श्रेय उन्हें ही जाता है।फिर चाहे उनका 2004 से 2014 का प्रधानमंत्री का कार्यकाल रहा हो या फिर इससे पूर्व वित्त मंत्री के रूप में उनका कामकाज।
मनमोहन सिंह के नाम एक और उपलब्धि दर्ज है, वह जवाहरलाल नेहरू के बाद पहले भारतीय थे, जो लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बने।
मनमोहन सिंह ने 1984 के सिख दंगों के लिए संसद में माफ़ी मांगी थी।1984 में हुए सिख दंगों में लगभग 3000 सिख मारे गए थे।मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री के रूप में दूसरा कार्यकाल खासा चर्चित रहा।इस दौरान भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आए। कई लोगों का मानना है कि इन घोटालों की वजह से ही 2014 के आम चुनावों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। हालांकि उसके बाद शासन में आई भाजपा के अबतक शासनकाल में एक भी भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध नहीं हुए।
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का गुरुवार को 92 साल की उम्र में निधन हो गया. यह जानकारी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली ने मीडिया को दी….
एम्स ने प्रेस रिलीज में बताया कि 92 वर्षीय मनमोहन सिंह को गुरुवार की शाम घर पर “अचानक बेहोश” होने के बाद गंभीर हालत में एम्स केआपातकालीन विभाग लाया गया था।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पंजाब यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद कैंब्रिज विश्वविद्यालय से मास्टर्स किया था। उन्होंने ऑक्सफॉर्ड से डी फिल किया था।
मनमोहन सिंह का जन्म 26 सितंबर 1932 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में हुआ था। यह हिस्सा अब पाकिस्तान में है। पंजाब यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से मास्टर्स किया और ऑक्सफॉर्ड से डी फिल किया।
मनमोहन सिंह की बेटी दमन सिंह ने अपनी किताब में लिखा है कि कैंब्रिज में पढ़ाई के दौरान उन्हें आर्थिक तंगी से गुज़रना पड़ा था। दमन सिंह ने लिखा था, ”उनकी ट्यूशन और रहने का खर्च सालाना लगभग 600 पाउंड था।पंजाब यूनिवर्सिटी की स्कॉलरशिप से उन्हें करीब 160 पाउंड मिलते थे, बाकी के लिए उन्हें अपने पिता पर निर्भर रहना पड़ता था।मनमोहन बेहद सादगी और किफायत से जीवन बिताते थे। डाइनिंग हॉल में सब्सिडी वाला भोजन अपेक्षाकृत सस्ता था, जिसकी कीमत दो शिलिंग छह पेंस थी।”
दमन सिंह ने अपने पिता को “घर के कामों में पूरी तरह असहाय” बताते हुए कहा कि “वो न तो अंडा उबाल सकते थे और न ही टीवी चालू कर सकते थे।”
मनमोहन सिंह साल 1991 में भारत के वित्त मंत्री के तौर पर उभरे।ये ऐसा दौर था जब देश के आर्थिक हालात बहुत ख़राब थे।
उनकी अप्रत्याशित नियुक्ति ने उनके लंबे और सफल करियर को नई ऊंचाई दी।उन्होंने एक शिक्षाविद और नौकरशाह के रूप में तो काम किया ही। सरकार के आर्थिक सलाहकार के रूप में भी योगदान किया और भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर भी रहे।
मनमोहन सिंह को बहुत अच्छी तरह से पता था कि उनका राजनीतिक जनाधार नहीं है…
वित्त मंत्री के रूप में अपने पहले भाषण में उन्होंने विक्टर ह्यूगो का हवाला देते हुए कहा, “इस दुनिया में कोई ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती जिसका समय आ गया है।”
ये भाषण उनके महत्वाकांक्षी और अभूतपूर्व आर्थिक सुधार कार्यक्रम की शुरुआत थी।उन्होंने टैक्स में कटौती की, रुपये का अवमूल्यन किया।सरकारी कंपनियों का निजीकरण किया और विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया।
इससे अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ, उद्योग तेजी से बढे़, बढ़ रही महंगाई पर काबू पाया गया और 1990 के दशक में विकास दर लगातार ऊंची बनी रही।
वित्त मंत्री के तौर पर उन्होंने जिन आर्थिक सुधारों की गति दी थी उन्हें प्रधानमंत्री रहते आगे नहीं बढ़ा पाए: वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सिंह
हिंदुस्तान अख़बार, आज अखबार में रिपोर्ट तथा कई कवि सम्मेलनों में अपनी गजल और कविता पढ़ चुके जौनपुर जिले के शाहगंज तहसील क्षेत्र के निवासी राजकुमार सिंह ने कहा:
मनमोहन सिंह ने दूसरी बार साल 2009 में कांग्रेस को निर्णायक चुनावी जीत दिलाई।लेकिन जीत की चमक जल्द ही फीकी पड़ने लगी और उनका दूसरा कार्यकाल ज्यादातर गलत कारणों से खबरों में रहा। उनके मंत्रिमंडल के कई मंत्रियों पर घोटाले के आरोप लगे, जिनसे देश को कथित तौर पर अरबों डॉलर का नुकसान हुआ। विपक्ष ने संसद को लगातार ठप रखा, और नीतिगत ठहराव के चलते देश को गंभीर आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ा।
बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सिंह को भारत का “सबसे कमजोर प्रधानमंत्री” कहा।इस पर मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल का बचाव करते हुए कहा कि उनकी सरकार ने देश और जनता के कल्याण के लिए “पूरी प्रतिबद्धता और समर्पण” के साथ काम किया।






















