नजरिया न्यूज। जीतू दास।भरगामा। लोकतंत्र के महापर्व में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्र के मतदाता तैयार बैठे हैं। संबंधित मतदान केंद्रों पर मतदान कर्मी की आवाजाही काफी तेज हो गई है। पूरे देश में चुनाव का शोर… फिर भी क्यों शांत है अररिया जिला, मतदाताओं की चुप्पी बढ़ा रही राजनीतिक पार्टियों की धड़कन।
अररिया लोकसभा सीट के लिए 7 मई को होने वाले मतदान की घड़ी अब निकट है लेकिन अभी तक चुनाव जैसा अहसास नहीं हुआ। पिछले चुनावों में जिस तरह का माहौल चुनाव प्रचार के दौरान दिखता था और जैसी गर्माहट घुलती थी वह इस बार नदारद है। ऐसा नहीं कि अभियान के दौरान चुनाव प्रचार नहीं हुआ लेकिन स्वरूप कुछ अलग हीं है। इन सबों के बीच मतदाताओं की चुप्पी प्रत्याशियों के सूखे गले को और अधिक बढ़ा रही है। मतदान से पहले एक-एक पल मानों बेचैनी के साथ बीत रहा है वहीं चुनाव आयोग की सख्ती असामाजिक तत्वों की मंशा पर भी चोट पहुंचाने लगी है जगह-जगह अर्धसैनिक बलों की चहल कदमी व बुथो की सतत निगेहबानी को देख गड़बड़ी करने वाले लोग अब अपनी हरकतों को नियंत्रित करने के प्रयासरत नजर आ रहे हैं।
अररिया संसदीय क्षेत्र में सूरज की तपिश के बीच ठंडा चुनावी माहौल :-
चुनाव मैदान में उतरे प्रत्याशियों के साथ ही स्टार प्रचारक सभाएं भी कर रहें हैं। वादों-दावों की पोटली भी खुली, लेकिन वातावरण शांत-शांत सा दिख रहा है। न चुनावी शोर गूंजा और न झंडे-डंडों को लेकर कहीं मारामारी दिख रही है। मतदाता सबकी बात सुन रहें हैं, लेकिन जुबां पर खामोशी ओढ़े हुए हैं। मतदाता ने किसी को अपने मन की थाह नहीं लेने दी, जिसने राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों के दिलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। साथ ही चुनावी पारा न चढ़ने को लेकर तमाम कारण भी फिजा में तैर रहा हैं।
बुजुर्गों को चौखट पर आने वाले प्रत्याशियों को आशीर्वाद देने का इंतजार रहता था, लेकिन इस बार नामांकन के बाद समय आंखों ही आंखों में बीत रहा है। गांव से लेकर शहरों का परिदृश्य इससे जुदा नहीं रहा।
राजद व भाजपा के मध्य ही भिड़ंत :-
पिछले चुनावों के आलोक में अररिया संसदीय क्षेत्र के राजनीतिक परिदृश्य पर नजर दौड़ाएं तो यहां परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों राजद व भाजपा के मध्य ही भिड़ंत होती आई है। इस बार की तस्वीर भी ऐसी ही दिख रही है, लेकिन पिछली बार तक जिस तरह से चुनावी पारा चढ़ता रहा है, वह गायब है।
माहौल गर्माने को बहुत अधिक प्रयास भी होते नजर नहीं आए। भाग्यविधाता मतदाताओं की चौखट पर आने प्रत्याशियों व समर्थकों ने वादे-दावे खूब किए। बावजूद इसके न तो पंपलेट बांटने की कहीं होड़ दिख रही और न वाल राइटिंग, बैनर-पोस्टर की।
आम मतदाता की राय :-
अररिया संसदीय क्षेत्र के ग्रामीण क्षेत्र के मतदाता बताते हैं इस बार के लोकसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार भी बड़ा उलटफेर करने का माद्दा रखता है। यूं कहें तो चुनाव राजद,भाजपा व निर्दलीय के बीच त्रिकोणीय मुकाबला भी हो सकता है।
राजनीतिक कारण भी रहे जिम्मेदार :-
ऐसे में फिजाओं में यह प्रश्न तैर रहा है कि आखिर, हर बार की तरह इस बार चुनाव के समय सरगर्मी क्यों नहीं उठा। क्यों चुनावी पारे ने उछाल नहीं भरी। यानी, स्वाभाविक रूप से हर किसी की जुबां पर यह विषय चर्चा के केंद्र में है। सूरज की तपिश के बीच वातावरण में चुनावी तापमान नहीं दिखा तो इसके पीछे राजनीतिक कारण भी समाहित हैं।
भाजपा ले रही है मनोवैज्ञानिक बढत :-
असल में भाजपा ने अपने चुनाव अभियान का आगाज काफी पहले से ही प्रारंभ कर एक प्रकार से मनोवैज्ञानिक बढ़त ले ली है। इस बार चार सौ पार का नारा दिया। इसका जनता पर क्या असर पड़ा, यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा, लेकिन राजद पर इसका असर अवश्य देखा गया।
राजद भी चुनावी मैदान में कमतर नहीं :-
राजद में चुनाव लडऩे को लेकर चली ना-नुकुर को इससे जोड़कर देखा जा रहा है और इसने पार्टी कार्यकर्ताओं के उत्साह को कम करने का काम किया। यद्यपि, बाद में प्रत्याशियों के मैदान में उतरने पर राजद कार्यकर्ता भी जुटे, लेकिन वरिष्ठ नेता अपने दड़बों से बाहर नहीं निकले।
स्टार प्रचारकों की रही धूम :-
चुनाव प्रचार अभियान में भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मनोज तिवारी, समेत अन्य स्टार प्रचारकों की नियमित अंतराल में सभाएं आयोजित की। राजद के स्टार प्रचारकों में शामिल बड़े नेताओं में केवल पुर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव की सभा ही संसदीय क्षेत्र में हुई।
चुनावी गर्माहट न होने के अपने-अपने दावे
इस सबके बावजूद चुनावी पारा उस हिसाब से नहीं चढ़ा, जैसा पूर्व के चुनावों में चढ़ता था। इसे लेकर सबके अपने-अपने दावे हैं। कुछ लोग इसे बदलाव के तौर पर देख रहे हैं। उनका कहना है कि चुनाव प्रचार अभियान के तौर तरीकों को लेकर अब सोच बदल रही है। मतदाता परिपक्व हो चुका है। वह चुनावी शोरगुल से प्रभावित नहीं होता, बल्कि दलों, प्रत्याशियों को अपनी कसौटी पर परखता है। दूसरी तरफ कुछ लोग यह चिंता जताते हैं कि इस बार जैसा परिदृश्य दिखा है, उसका मतदान पर असर न पड़े। ऐसी ही चिंता राजनीतिक दलों व बौद्धिक वर्ग के बीच है। यद्यपि, वे यह भी मानते हैं कि अररिया संसदीय क्षेत्र के मतदाता हमेशा से ही अपनी परिपक्व सोच का परिचय देता आया है। वह चुनाव में बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाएगा और मतदान के पिछले कीर्तिमान इस बार ध्वस्त करेगा।






















