दुर्केश सिंह, संपादकीय प्रभारी नजरिया न्यूज, 19मार्च।
बीबीसी के चार पत्रकारों को प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका पुरस्कार दिया गया है।
पुरस्कार पाने वालों में कीर्ति दुबे, विकास त्रिवेदी, तेजस वैद्य और जुगल पुरोहित शामिल हैं।
समारोह के मुख्य अतिथि केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने सभी विजेताओं को पुरस्कार दिए।
हिंदी जर्नलिज़्म कैटेगरी में बीबीसी हिंदी की कीर्ति दुबे और ब्रॉडकास्ट के लिए जुगल पुरोहित को ये पुरस्कार दिया गया है।
वहीं, रीजनल कैटेगरी में बीबीसी गुजराती के तेजस वैद्य को ये पुरस्कार दिया गया।
उल्लेखनीय है कि रामनाथ गोयनका एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म अवार्ड्स (आरएनजी अवॉर्ड्स) देश में पत्रकारिता के क्षेत्र में दिए जाने वाले प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक है।रामनाथ गोयनका द इंडियन एक्सप्रेस के संस्थापक थे।उन्हीं के नाम पर 2006 से हर साल यह पुरस्कार दिया जाता है।
इस साल ये पुरस्कार साल 2021 और 2022 के लिए दिया गया है। कुल 43 लोगों को इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
पुरस्कार देने वाली जूरी में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस बीएन श्रीकृष्णण, ओपी जिंदल ग्लोबल के कुलपति प्रोफ़ेसर सी राज कुमार, माखनलाल चतुर्वेदी यूनिवर्सिटी के कुलपति केजी सुरेश और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी शामिल थे।
इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर इन चीफ़ राजकमल झा ने इस मौके पर बताया :
इस साल रामनाथ गोयनका पुरस्कार के लिए कुल 1313 आवेदन मिले थे, जो 18 साल पहले रामनाथ गोयनका अवॉर्ड की शुरुआत के बाद से एक रिकॉर्ड संख्या है।
उन्होंने कहा कि 1000 से अधिक पत्रकारों और दो दर्जन से अधिक लेखकों की ओर से मिले ये आवेदन हमें ऐसे समय में उम्मीद देते हैं जब हर दिन पत्रकारिता को दबाने से जुड़ी ख़बरों को हम सुनते हैं। आज के दौर में बहुत से लोग हमारी परवाह नहीं करते, सिवाय हमारे माता-पिता और कुछ करीबी दोस्तों के। मैं देख रहा हूं कि कई विजेता आज अपने माता-पिता के साथ यहां आए हैं।उनका शुक्रिया यहां आने के लिए।
पिछले महीने के पाँच उदाहरण मैं दूंगा।एक हाई कोर्ट के जज ने अदालत परिसर में एक रिपोर्टर को कहा कि वो उसे यहां की ख़बरें रिपोर्ट करते नहीं देखना चाहते।कुछ दिन बाद यही जज इस्तीफ़ा देकर एक राजनीतिक दल में शामिल होते हैं और हर तरफ़ उनके बारे में अच्छा-अच्छा बताया जाता है।
एक पत्रकार ने भी राजनीतिक पार्टी का दामन थामा और उन्हें टिकट भी मिल गया।एक पत्रकार वो भी हैं जिन्हें इस शहर में दो दशक रहने के बाद इस जगह को छोड़ना पड़ा क्योंकि उन्होंने कुछ बदनाम करने वाली कहानियां लिखीं।
एक नेता हैं, जो एक पत्रकार के सवाल पूछने पर उनसे कहते हैं, “आपके मालिक का क्या नाम है.” और जब उन नेता के समर्थकों ने रिपोर्टर के साथ धक्का-मुक्की की तो उन्होंने कहा- उसको मत मारो यार, उसको मत मारो।
और ऐसे कुछ मालिक भी हैं जो इस कदर घुटनों के बल गिर गए हैं और उस स्थिति में इतने सहज हैं कि अब यदि उठें तो तकलीफ़ होगी।
राजकमल झा ने कहा:
“यहां ईज़ ऑफ़ डुइंग बिज़नेस है और अनईज़ ऑफ़ डुइंग जर्नलिज़म भी और इसलिए मैं केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का यहां आने के लिए शुक्रगुज़ार हूं।
उन्होंने कहा:
पत्रकारिता के लाभार्थियों को खोजना मुश्किल हो सकता है लेकिन आज जिन कहानियों को हमने सम्मानित किया है वो पत्रकारिता के लाभ को दिखाते हैं।
बीबीसी के चारों पत्रकारों को जिन कहानियों के लिए पुरस्कार दिए गए हैं , एक स्टोरी:
_यूपी: मॉब लीचिंग, पुलिस की जांच और इंसाफ: कीर्ति दूबे
6 नवंबर, 2021:_
साल 2015 की बात है, यूपी के दादरी में अख़लाक़ को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला, ये गाय के नाम पर की गई मॉब लिंचिंग की संभवत: पहली घटना थी जो आने वाले वक्त में एक तयशुदा स्क्रिप्ट की तरह दोहराई जाने लगी.
बीते छह साल में देश के कई राज्यों से एक-के-बाद एक लिंचिंग की ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं जिनमें मारे जाने वाले व्यक्ति की धार्मिक पहचान उसकी हत्या की वजह थी, ऐसी हत्याओं को दुनिया के कई देशों में ‘हेट क्राइम’ की श्रेणी में रखा जाता है. भारत में ‘हेट क्राइम’ के तहत आँकड़े दर्ज नहीं किए जाते.
पिछले कुछ सालों में देश के कई राज्यों में धर्म के आधार पर निशाना बनाकर की गई हिंसा और मॉब लिंचिंग (भीड़ की हिंसा की वजह से मौत) की घटनाएँ सामने आई हैं.
चूँकि देश में हेट क्राइम के सरकारी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए बीबीसी ने साल 2016 और साल 2021 में उत्तर प्रदेश में धर्म के आधार पर भीड़ की गंभीर हिंसा के आंकड़ों का अध्ययन किया और पाया कि 2016 में जनवरी से लेकर अगस्त तक मुसलमानों के साथ हेट क्राइम के 11 गंभीर मामले सामने आए, जबकि साल 2021 में जनवरी से लेकर अगस्त के बीच मुसलमानों के खिलाफ़ संगीन हिंसक वारदातों की संख्या 24 थी. 2016 के पहले आठ महीनों का आंकड़ा तब के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के दौर का है, जबकि 2021 के पहले आठ महीनों का आंकड़ा मौजूदा योगी सरकार के कार्यकाल का है.
यहाँ हमने उत्तर प्रदेश के केवल संगीन मामलों को शामिल किया है. हिंसा, मारपीट के छिट-पुट मामले होते रहे हैं जो न तो मीडिया में रिपोर्ट हो पाते हैं और न ही पुलिस को रिपोर्ट किए जाते हैं लेकिन अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना पैदा करते हैं.
साल 2019 में मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट आई जिसके मुताबिक़ ‘हेट क्राइम’ के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है. यहाँ ध्यान रखा जाना चाहिए कि आबादी के हिसाब से उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है और हेट क्राइम के एमनेस्टी के आंकड़ों में मुसलमानों के अलावा दलितों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा भी शामिल है.
ये समझना ज़रूरी है कि धर्म या जाति के आधार पर हुई मारपीट की घटनाएँ ही ‘हेट क्राइम’ के दायरे में आती हैं, हर मारपीट या लिंचिंग को ‘हेट क्राइम’ नहीं कहा जा सकता, मसलन, धार्मिक शिनाख्त के बिना किसी जेबकतरे को अगर भीड़ पीट-पीटकर मार डाले, तो ये लिंचिंग है, लेकिन हेट क्राइम नहीं है, भीड़ में शामिल लोगों की धार्मिक पहचान से भी तय होता है कि वह घटना हेट क्राइम है, या नहीं.
जब भीड़ किसी व्यक्ति की जान ले लेती है तो उसे तकनीकी तौर पर लिचिंग माना जाता है. कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें हमले के पीछे पीड़ित व्यक्ति के धर्म की कोई भूमिका नहीं थी, उन्हें हेट क्राइम नहीं कहा जा रहा.
उत्तर प्रदेश में हिंसक भीड़ के हमलों की घटनाओं पर अतिरिक्त महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) प्रशांत कुमार बीबीसी से कहते हैं, “हमने डीजीपी स्तर पर कई सर्कुलर जारी किए हैं और वक़्त-वक़्त पर इन सर्कुलरों को दोहराते भी रहे हैं कि ऐसी लिंचिंग किसी भी कीमत पर नहीं होनी चाहिए, अगर किसी ने कुछ गलत किया भी है तो लोगों को उसे पीटने का कोई हक़ नहीं है और ऐसा होता है तो पीटने वाले के खिलाफ़ कठोर कार्रवाई की जाती है. किसी को भी कानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं है, चाहे वह कोई भी हो.”





















