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बैंक के थ्रू पैसा लिया गया है। आम भारतीय यही मानेगा। यह पैसा भारतीय संविधान में असंवैधानिक तरीके से बदलाव करके भारत को समृद्धि प्रदान करने वाले उद्योगपतियों से वसूला गया है, इसे मतदाताओं की अदालत में विपक्ष को सिद्ध करना पड़ेगा। मित्र मीडिया इतनी बड़ी वसूली को जायज ठहराने की कोशिश करेगी, यह सबसे बड़ी चुनौती है: त्वरित टिप्पणी
दुर्केश सिंह, संपादकीय प्रभारी नजरिया न्यूज, 15मार्च।
इलेक्ट्रोल बॉन्ड कानून असंवैधानिक है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद जो सबसे आश्चर्यजनक खुलासा सामने आया है, एक लाटरी के धंधे से जुड़े व्यवसायी से जुड़ा है। ईडी की छापेमारी में उसकी कुल परिसंपत्ति 400करोड़ की निकली थी लेकिन उसके नाम से 1368करोड़ रुपये का इलेक्ट्रोल बॉन्ड खरीदा गया है। यह जानकारी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया द्वारा भारतीय निर्वाचन आयोग को सुपुर्द कि गई इलेक्ट्रोल बॉन्ड खरीदने वाले की सूची में दी गई है।
सोशल मीडिया में देश के शीर्ष बुद्धिजीवियों के बीच असंवैधानिक घोषित इलेक्ट्रोल बॉन्ड पर चर्चा के दौरान बताया गया: यह समझ में नहीं आ रहा है कि जिसके यहां ईडी की रेड हो रही है। आईटी की रेड हो रही है। वह व्यक्ति इलेक्ट्रोल बॉन्ड के माध्यम से राजनीतिक पार्टियों को चंदा दे रहा है।
यही तो कृष्ण सुदामा की कहानी में सुनाया गया था, कौन सा चावल कृष्ण को सुदामा दे रहा था।1368 करोड़ रुपये चंदा में लाटरी वाला दे रहा है। क्या यह सरकारी खजाने पर डकैती नहीं है, इनकम टैक्स की चोरी नहीं है। ईडी और आईटी के छापामारी का लक्ष्य यह कदापि नहीं होता कि आरोपित 1368करोड़ रुपये का इलेक्ट्रोल बॉन्ड खरीदने के लिए मजबूर हो जाए।
इलेक्ट्रोल बॉन्ड खुलासे पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर विमर्श करते देश के ख्यातिलब्ध बुद्धिजीवी
फिलहाल देश आजाद होने के बाद से आजतक यही होता रहा है। ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों तक से सोशल आडिट के नाम पर रुपये की वसूली की जा रही है। एक वर्ष के लिए आडिटर बनने वाले तीन-तीन लाख रुपये घूस देने को मजबूर किया जाता है। घूस देकर सोशल आडिटर बनने वाला क्या करेगा, यह कल्पना कोई भी कर सकता है। इलेक्ट्रोल बॉन्ड विमर्श में आगे की क्या चर्चा हुई, पढ़िए:
लाटरी वाल क2021के नाम से2021में पैसा दिया गया। 2022में पैसा दिया गया। 2023में पैसा दिया गया। लगातार 2024तक पैसा दिया गया।अन्य सभी डोनर का नाम कल तक सामने आ जाएंगें।यह सब एनालिसिस कोई भी गुगल से कर सकता है।बड़ा चंदा देने वाली एक कंपनी को 14 हजार करोड़ रुपये से बड़ा ठेका दिया गया है। कोविड वैक्सीन बनाने वाले के नाम से भी 50करोड़ का चंदा दिया गया है।कलंक भरा पन्ना उजागर हूंआ है। अजीव एचीवमेंट है। बैंक के थ्रू पैसा लिया गया है। आम भारतीय यही मानेगा। यह पैसा भारतीय संविधान में बदलाव करके असंवैधानिक तरीके से भारत को समृद्धि प्रदान करने वाले उद्योगपतियों से वसूला गया है, इसे मतदाताओं की अदालत में विपक्ष को सिद्ध करना पड़ेगा। मित्र मीडिया इतनी बड़ी वसूली को जायज ठहराने की कोशिश करेगी, यह सबसे बड़ी चुनौती है।





















