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रिपोर्ताज: साहित्य समाज का दर्पण होता हैं–माधवी नामक कहानी की नायिका लोकसभा चुनाव 2024 में किसका कर रही प्रतिनिधित्व 

रिपोर्ताज: साहित्य समाज का दर्पण होता हैं–माधवी नामक कहानी की नायिका लोकसभा चुनाव 2024 में किसका कर रही प्रतिनिधित्व 

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रिपोर्ताज: साहित्य समाज का दर्पण होता हैं–माधवी नामक कहानी की नायिका लोकसभा चुनाव 2024 में किसका कर रही प्रतिनिधित्व 

by Kumar Shrivastav
March 15, 2024
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रिपोर्ताज: साहित्य समाज का दर्पण होता हैं–माधवी नामक कहानी की नायिका लोकसभा चुनाव 2024 में किसका कर रही प्रतिनिधित्व 
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=आत्मानंद में गुणों का भंडार था। वह साहसी, निस्वार्थ और देशप्रेमी होने के साथ-साथ कर्तव्य का पालन करने वाला इंसान था। साथ ही वो राजनीति में रुचि रखता था। वो बेबाक था और अपने राजनीतिक लेखों की वजह से सरकारी कर्मचारियों की नजरों में आ गया था। पुलिस भी उसकी हरकतों पर नजर रखती थी। पुलिस बस एक मौके की तलाश में थी, ताकि वो उसे जेल की सलाखों के पीछे डाल सकें…

 

*दुर्केश सिंह, संपादकीय प्रभारी नजरिया न्यूज, 14मार्च।*

ख्यातिलब्ध कहानीकार मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी में नायिका का नाम माधवी है। लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर बिहार के एक बुद्धिजीवी ने इस कहानी को शेयर करते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, उतर प्रदेश की भूतपूर्व मुख्यमंत्री बहन मायावती और राजस्थान की भूतपूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया का ध्यान आकर्षित किया है। मुंशी प्रेमचंद की कहानी की नायिका माधवी, मदर इंडिया मूवी और लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान की परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व करती दिख रही है…

 

 

 

माधवी के पति की 22 साल पहले मौत हो गई थी। उसके पास कोई धन दौलत नहीं थी और संपत्ति के नाम पर सिर्फ एक बेटा था, जो इस वक्त जेल में बंद था। अपने उस घर में वो अकेली पड़ गई थी और उसके आंसू तक पोंछने वाला कोई नहीं था।

माधवी ने बड़ी दुख तकलीफों को झेलते हुए अपने बच्चे को पाल पोस कर बड़ा किया था। अगर मां-बेटे को जुदा करने वाली मौत होती, तो माधवी सब्र कर लेती और उसके मन में किसी के लिए क्रोध न होता, लेकिन उन्हें जुदा करने वाले तो कोई और थे, जिनके अत्याचार को सहना उसके लिए मुश्किल हो रहा था। माधवी के मन में बार-बार उन स्वार्थियों से बदला लेने का विचार घूम रहा था।

माधवी के लिए उसका बेटा ही सब कुछ था, जिसे देख कर ही उसे जिंदगी में आगे बढ़ने का हौसला मिलता था। माधवी का बेटा सुंदर होने के साथ ही बहुत होनहार भी था। माधवी ने उसकी अच्छी परवरिश की थी। उसकी गली के सारे लोग उसके बेटे की तारीफ करते नहीं थकते थे और यहां तक कि स्कूल के अध्यापक तक उस पर जान छिड़कते थे।

माधवी के बेटे का नाम आत्मानंद था। आत्मानंद से दूसरों की दुख तकलीफें देखी नहीं जाती थी और लोगों की मदद करने के लिए वह हमेशा तत्पर रहता था। उसे देख कर कोई सोच भी नहीं सकता था कि वह कोई अपराध कर सकता है। माधवी भी यही सोचकर तड़पते हुए दिन काट रही थी कि आखिर उसका क्या अपराध था?

 बाएं से दाएं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, यूपी की भूतपूर्व मुख्यमंत्री बहन मायावती, राजस्थान की मुख्यमंत्री भूतपूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया 

आत्मानंद में गुणों का भंडार था। वह साहसी, निस्वार्थ और देशप्रेमी होने के साथ-साथ कर्तव्य का पालन करने वाला इंसान था। साथ ही वो राजनीति में रुचि रखता था। वो बेबाक था और अपने राजनीतिक लेखों की वजह से सरकारी कर्मचारियों की नजरों में आ गया था। पुलिस भी उसकी हरकतों पर नजर रखती थी। पुलिस बस एक मौके की तलाश में थी, ताकि वो उसे जेल की सलाखों के पीछे डाल सकें।

 

जिले में पड़े एक डाके ने उन सभी लोगों को आत्मानंद को फंसाने का अवसर दे दिया, जो उसे पसंद नहीं करते थे। डाके से तार जुड़े होने का हवाला देकर आत्मानंद के घर की तलाशी ली गई, जहां मिले कुछ पत्रों व लेखों को डाके का मुख्य कारण बताते हुए उसे गिरफ्तार कर लिया गया। अपने आरोपों को सिद्ध करने के लिए पुलिस ने कुछ और युवकों को भी गिरफ्तार कर लिया और आत्मानंद को गिरोह का मुखिया करार दे दिया गया। जिसके बाद महीने भर तक मुकदमा चला और न जाने कहां-कहां से पुलिस ने ऐसे झूठे गवाह सामने लाकर खड़े कर दिए कि कोर्ट ने आत्मानंद समेत सभी युवकों को दोषी करार दे दिया और 4 साल के कठोर कारावास की सजा सुना दी।

बेटे की हर सुनवाई में जा रही माधवी ने देखा कि इंसान का चरित्र कितना नीच हो सकता है और वह अपने स्वार्थ के लिए किसी को भी हानि पहुंचाने से नहीं चुकता। अपने बेटे को हथकड़ियों में पुलिस द्वारा जेल ले जाते देख माधवी वहीं बेहोश होकर गिर गई। जिसके बाद कुछ भले लोगों ने उसे तांगे पर बैठाकर घर तक पहुंचाया।

माधवी को जब होश आया, तो उसे पूरा वाकया याद आया। अपने इकलौते सहारे से दूर होने का गम उसे खाए जा रहे था, जो उसे एक पल भी चैन की सांस तक लेने नहीं दे रहा था। कोई रास्ता न सूझने पर माधवी ने अपनी वेदना को ही प्रतिशोध में बदलने का फैसला लिया और उसके बेटे की यह दुर्दशा करने वालों से बदला लेना ही अपने जीवन का मकसद बना लिया।

माधवी के मन में भी प्रतिशोध की ज्वाला धधक रही थी। वह बस यही सोच रही थी कि ऐसा क्या करे कि जिससे उन अत्याचारियों से बदला लिया जा सके? देर रात तक माधवी सोचती रही कि विधवा जीवन जीते 22 साल बीत गए, लेकिन अब उसे बाहर निकलना होगा। अपने अंतर्मन से माधवी कहने लगी कि इस दुनिया में अच्छे कर्मों की कोई जगह नहीं और हो सकता है ईश्वर ने भी निराश होकर हमसे मुंह फेर लिया हो, तो ऐसे में उन अत्याचारियों को दंडित करने के लिए उसे ही कदम उठाना होगा।

शाम का वक्त था। लखनऊ में एक बड़ा-सा बंगला झिलमिलाती लाइटों से सजा था। जहां दोस्तों की महफिल सजी थी और गाना बजाना हो रहा था। एक ओर मेज आतिशबाजियों से सजी थी, तो दूसरी और तरह-तरह के पकवान रखे थे। बंगले के चारों ओर पुलिसकर्मी तैनात थे, क्योंकि वह बंगला पुलिस सुपरिटेंडेंट मिस्टर बागची का था। बागची ने एक बड़ा मार्के का केस जीता था, जिससे खुश होकर अफसरों ने उन्हें तरक्की दी थी, जिसकी खुशी में जश्न मनाया जा रहा था। मार्के का केस जिसमें पुलिस बेगुनाह युवकों को झूठे केस में फंसा कर जेल में भर देती थी।

यहां आए दिन उत्सव होते ही रहते थे। महफिल में रौनक बढ़ाने के लिए मुफ्त में गाने-बजाने वाले, आतिशबाजियां और आधे दामों पर मिठाइयां व फल-फूल उन्हें आसानी से मिल जाते थे। दौड़ धूप करने के लिए सिपाहियों की एक टुकड़ी हर वक्त उनके घर पर तैनात रहती थी। महफिल में गाने-बजाने का कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मेहमान अब भोजन करने लगे थे। दुकान से दावत का सामान ढोने वाले मजदूर उन्हें कोसते हुए वहां से चले गए थे।

बस बाकी बचे मजदूरों के साथ एक बूढ़ी औरत वहां काम कर रही थी। वो बूढ़ी औरत चेहरे पर हल्की मुस्कान लिए अपने काम में मग्न थी। वह महिला और कोई नहीं, बल्कि माधवी थी, जो बदला लेने के लिए मजदूर बनकर काम कर रही थी। महफिल खत्म होते-होते सभी मेहमान जा चुके थे। इक्के-दुक्के मजदूर बचा हुआ खाना समेट रहे थे। माधवी एक कोने में चुपचाप बैठी हुई एकटक सभी को देखे जा रही थी।

सहसा मिस्टर बागची की नजर माधवी पर पड़ी, तो वो उसके पास पहुंचे और बोले, “तुम अब तक यहां क्या कर रही हो? कुछ खाने के लिए मिला या नहीं?” माधवी ने नजर उठाकर बागची को देखकर कहा, “साहब खाना तो मिल गया, लेकिन मेरे पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है, अगर आपको ऐतराज न हो, तो मुझे यहीं कोने में पड़ी रहने दीजिए।” माधवी की बात सुनकर बागची ने कहा, “नौकरी कर लेगी बंगले में? बच्चे को पालना आता है क्या?” बागची की बात सुनकर माधवी ने तपाक से कहा, “जी साहब, बच्चों को अच्छे से खिलाना जानती हूं। इसके अलावा, घर के छोटे-बड़े सभी काम कर सकती हूं। बस मुझे एक मौका दे दीजिए।” माधवी की ओर ध्यान से देखते हुए बागची ने कहा, “ठीक है, तुम आज से ही काम शुरू कर दो।”

माधवी को बागची के बंगले में काम करते हुए एक महीने से अधिक हो गया था। माधवी अपने काम में इतनी निपुण थी कि उससे पूरा घर खुश था। बागची की पत्नी का स्वभाव चिड़चिड़ा था और वह आलस व अपनी खराब सेहत के चलते दिन भर बिस्तर पर या सोफे पर पड़ी रहती और नौकरों पर चिल्लाती रहती। उसके स्वभाव के कारण बच्चे का ध्यान रखने वाली आया ज्यादा दिन न टिक पाती। माधवी उसकी जली कटी बातें सुनकर भी चुपचाप अपने काम में लगी रहती, इसलिए बागची की पत्नी को उससे कुछ खास शिकायतें नहीं थी। उसने बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी भी माधवी को ही दे दी थी।

बागची और उनकी पत्नी को इससे पहले भी कई बच्चे हो चुके थे, लेकिन अज्ञात कारणों से उनका एक भी बच्चा कुछ महीनों या फिर साल भर से ज्यादा जीवित नहीं बच पाता था। इसलिए, इस बच्चे पर दोनों मां-बाप की जैसे जान बसती थी। पढ़े लिखे होने के बावजूद दोनों अपने बच्चे की सुरक्षा के लिए टोना-टोटका व जंतर-मंतर अपनाने से भी परहेज न करते थे।

मिसेज बागची ने तुरंत नौकरों से अलाव जलाने को कहा। मिसेज बागची और माधवी दोनों पूरी रात बच्चे को ठीक करने में जुटे रहीं। दोनों की आंखों से नींद जैसे कोसों दूर थी। ऐसे में सवेरा कब हो गया, दोनों को पता भी न चला। मिस्टर बागची को जैसे ही बच्चे के बीमार होने की खबर मिली वह डॉक्टर को लेकर सीधे घर पहुंचे। 3 दिन में बच्चे की हालत में सुधार आने लगा, लेकिन वह काफी कमजोर हो गया था।

 

बच्चे का ख्याल रखने में माधवी ने दिन-रात एक कर दिया। यह वही माधवी थी, जो परिवार का सर्वनाश करने का संकल्प लिए उस घर में आई थी और आज उसी घर के चिराग की सलामती के लिए दिन में हजारों बार ईश्वर से दुआएं मांग रही थी। शायद माधवी की दुआओं का ही असर था कि बच्चे की सेहत में धीरे-धीरे सुधार होने लगा।

 

एक सुबह मिस्टर बागची बच्चे के झुले के पास बैठे हुए थे और मालकिन सिर दर्द के कारण चारपाई पर पसरी हुई थी। माधवी पास में ही बैठी बच्चे के लिए दूध गर्म कर रही थी। माधवी की ओर देखते हुए मिस्टर बागची ने कहा, “हम जब तक जिएंगे तुम्हारे एहसान के तले दबे रहेंगे। यह तुम ही हो जो बच्चे को मौत के मुंह से खींच लाई, वरना हम तो उम्मीद ही हारने लगे थे

अंग्रेजों को जहां 100 खून भी माफ होते हैं, लेकिन हम हिंदुस्तानियों की एक गलती भी हमें भारी पड़ सकती है। इसलिए, मेरी विनती है कि हमारे बेटे को स्वीकार कर लो।”

 

माधवी को भी उस बच्चे से बेहद लगाव था, इसलिए वह खुशी-खुशी मान गई। गदगद होते हुए माधवी ने कहा, “आप दोनों की अगर यही इच्छा है, तो मैं बच्चे को अपनाने के लिए तैयार हूं। मुझसे जो बन पड़ेगा, मैं करूंगी। मेरी भगवान से बस यही दुआ है कि हमारे बच्चे को वो अमर करे।”

 

बड़ी देर से बच्चा आराम से झूले में सो रहा था। चादर से उसका मुंह ढका हुआ था। माधवी ने दूध गर्म कर बच्चे को पिलाने के लिए जैसे ही उसके मुंह से चादर को हटाया, उसके मुंह से जोर से चीख निकल गई। बच्चे का शरीर पूरी तरह ठंडा हो चुका था और चेहरा पीला पड़ा था। माधवी ने जल्दी से बच्चे को गोद में उठाकर सीने से चिपका लिया और जोर जोर से रोने लगी। बालक सभी को छोड़ भगवान के पास जा चुका था।

 

दिन भर पूरे घर में मातम पसरा रहा और रोने की चीख पुकारों से जैसे पूरा घर कौंध गया हो। मिस्टर बागची और उनकी पत्नी का भी रो रोकर बुरा हाल था। माधवी जो खुद बच्चे को खोने के दर्द से तड़प रही थी, उन दोनों को सांत्वना दे रही थी। माधवी उनसे कह रही थी, “अगर उसके बस में होता, तो अपने प्राण देकर भी बालक को बचा लेती, लेकिन ऐसा संभव नहीं है।” माधवी जो अपना बदला लेने आई थी, ममता के बंधन में बंध स्वयं दुख लेकर जा रही है। सच कहते हैं कि मां का दिल दया का सागर होता है। मां वह देवी है, जिसकी निर्मलता को कोई भी मैला नहीं कर सकता।

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Kumar Shrivastav

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