अनिल उपाध्याय नजरिया न्यूज, 07मार्च।
इतिहास में कभी- कभी ऐसे लम्हे आते हैं, जब देश के कर्णधारों को निर्णय लेने पड़ते हैं कि देश कहां जाएगा! देश प्रकाश में जाएगा या अंधकार में लिप्त हो जाएगा!देश सुचिता से चलेगा या माफिया तंत्र से! कहते हैं कि लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पायी थी!ऐसा ही ऐतिहासिक क्षण आज सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ साहब के सामने है।
बुद्धिजीवी दिनेश बोरा ने मीडिया से बातचीत करते हुए उक्त बातें कही। वे स्टेट बैंक आफ इंडिया के उस आवेदन पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे जिसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार 13 मार्च तक इलेक्ट्रोल बॉन्ड खरीदने वालों के नाम को बताने में असमर्थता व्यक्त की गई है। इससे पहले 4पीएम चैनल के संपादक संजय शर्मा ने कहा:
लोकसभा चुनाव 2024 की गणना संपन्न हो जाने के बाद 160अरब रुपये का इलेक्ट्रोल बॉन्ड खरीदने वालों का नाम बताने के लिए सुप्रीम कोर्ट से 30जून तक का समय स्टेट बैंक ऑफ इंडिया द्वारा मांगा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रोल बॉन्ड खरीदने और बेंचने के कानून को असंवैधानिक बताते हुए स्टेट बैंक को 13मार्च तक इलेक्ट्रोल बॉन्ड खरीदने और किस राजनीतिक पार्टी को इलेक्ट्रोल बॉन्ड के माध्यम से चंदा दिया गया है, उनका नाम 06मार्च तक चुनाव आयोग देने का फैसला सुनाया था। चुनाव आयोग को उक्त सूचना 31मार्च तक अपनी वेबसाइट अपलोड करना था।
उन्होंने कहा:स्टेट बैंक किसे और क्यों बचा रही है।
4pmचैनल के संपादक संजय शर्मा ने कहा: 98प्रतिशत चंदा भाजपा को दिया गया है।
डिजिटल युग में 22हजार बॉन्डों की खरीद की सूचना देना घंटों का काम है। ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स के दबाव में तथाकथित ईमानदार पार्टी को चंदा दिया गया है, यह खुलासा इलेक्शन से पहले हो गया तो उसके दामन पर दाग लग जाएगा।
उन्होंने कहा: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की कोशिश से देश में एक संदेश चला गया है: कुछ छुपाया जा रहा है।
गौरतलब है कि बीते महीने सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने इलेक्टोरल बॉन्ड को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था और स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया जो इलेक्टोरल बॉन्ड बेचने वाला अकेला अधिकृत बैंक है, उसे निर्देश दिया था कि वह छह मार्च 2024 तक 12 अप्रैल, 2019 से लेकर अब तक ख़रीदे गए इलेक्टोरल बॉन्ड की जानकारी चुनाव आयोग को दे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इलेक्टोरल बॉन्ड को अज्ञात रखना सूचना के अधिकार और अनुच्छेद 19 (1) (ए) का उल्लंघन है।सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि राजनीतिक पार्टियों को आर्थिक मदद से उसके बदले में कुछ और प्रबंध करने की व्यवस्था को बढ़ावा मिल सकता है।
चुनाव आयोग को ये जानकारी 31 मार्च तक अपनी वेबसाइट पर जारी करनी थी।
बताते चलें कि इलेक्टोरल बॉन्ड राजनीतिक दलों को चंदा देने का एक वित्तीय ज़रिया बनाया गया था जिसे सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित कर दिया।यह एक वचन पत्र की तरह था जिसे कोई भी नागरिक या कंपनी भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से ख़रीद सकता था और अपनी पसंद के किसी भी राजनीतिक दल को गुमनाम तरीक़े से दान कर सकता था।
मोदी सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की घोषणा 2017 में की थी।इस योजना को सरकार ने 29 जनवरी 2018 को क़ानूनन लागू कर दिया था।





















