- अध्यात्म* : मैं जो कर रहा हूं उससे हमारी आत्मा की शक्ति बढ़ेगी। भ्रूण गर्भ की झिल्ली से ढका रहता है, उसी प्रकार ज्ञान और विवेक काम,वासना और प्रलोभन द्वारा ढके रहते हैं। संविधान का अनुपालन करने और कराने से कल्याणकारी विवेक के जन्म होंगे: भगवान श्रीकृष्ण
दुर्केश सिंह, संपादकीय प्रभारी नजरिया न्यूज।
धृतराष्ट्र ने अपने पुत्र दुर्योधन को हस्तिनापुर की सत्ता सौंप दी। भगवान श्रीकृष्ण के समझाने पर भी पांडवों को राजकाज में जिम्मेवारी सौंपनै के दुर्योधन तैयार नहीं हुआ। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं -कौरवों से ज्ञान युक्त युद्ध करो। वहीं अर्जुन कहता है- मैं राजा नहीं बनूंगा और युद्ध भी नहीं करुंगा -हे वृष्णिवंशी! मनुष्य न चाहते हुए भी पाप कर्मों के लिए प्रेरित क्यों होता है?ऐसा लगता है पाप कर्म में बलपूर्वक उसे लगाया जा रहा है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं -हे अर्जुन! सभी आत्माएं मुझसे हैं। वह इस संसार में कर्म के दौरान रजोगुण के संपर्क में आ जाते हैं। उससे स्नेह की मृत्यु हो जाती है। काम की तृप्ति आत्मा की पूरी नहीं होती। वह उसके मोह में फंस जाता है। संस्कृति, परंपरा, संविधान को भी रौंदकर न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका संतुष्टि चाहती है किन्तु मोह निरंतर बढ़ता ही जाता है। जिसकी आपूर्ति ठप होने पर क्रोध का जन्म होता है। क्रोध के जन्म से” स्नेह की मृत्यु हो जाती है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य का सबसे शत्रु “काम” है। संविधान, संस्कृति और परंपराओं का अनुपालन करने से विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका में सतोगुण का प्रादुर्भाव होता है। सतोगुण से स्नेह का जन्म होता है। स्नेह से भगवान के गुणों की प्राप्ति होती है। भगवान के गुणों की प्राप्ति से न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के प्रलोभन राष्ट्रभक्ति में तब्दील हो जाते हैं:
*धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।*
*यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा* *तेनेदमावृतम् ॥3.38 ॥*
जिस प्रकार अग्नि धुएं से, दर्पण धूल से और भ्रूण गर्भ की झिल्ली से ढका रहता है, उसी प्रकार ज्ञान और विवेक काम (वासना और इच्छाओं) द्वारा ढके रहते हैं।




















