अररिया बिजली विभाग का बड़ा खेल: 15 साल तक ग्रामीण को ‘शहरी’ बनाकर लूटा, अब गलती मानी तो थोप दिया 37 हजार का ब्याज!
अररिया/रानीगंज (अनमोल आनंद ): बिजली विभाग की लापरवाही और तानाशाही का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसे सुनकर कोई भी दंग रह जाए। रानीगंज के कुपाड़ी (वार्ड 3) निवासी एक उपभोक्ता को विभाग ने 15 वर्षों तक गलत टैरिफ में बिल भेजा। जब उपभोक्ता ने साक्ष्यों के साथ विभाग को घेरा, तो विभाग ने अपनी गलती तो स्वीकार कर ली, लेकिन अब “सुधार” के नाम पर उपभोक्ता पर करीब 40 हजार रुपये का अवैध ब्याज थोप दिया है।
क्या है पूरा मामला?
कुपाड़ी निवासी अनमोल कुमार ने वर्ष 2010 में ग्रामीण घरेलू श्रेणी (DS-1) का बिजली कनेक्शन लिया था। उनके पास विभाग की मूल रसीद भी मौजूद है। लेकिन विभाग की फाइलों में उन्हें ‘ग्रामीण’ के बजाय ‘शहरी/व्यावसायिक’ (URBAN/DS-2) उपभोक्ता बना दिया गया। 15 साल तक अनमोल कुमार विभाग के दफ्तरों के चक्कर काटते रहे, लेकिन किसी ने सुध नहीं ली।
विभागीय लीजर ने खोली पोल
हाल ही में जब पटना की टीम बिल वसूली के लिए पहुंची और मामला गरमाया, तो विभाग के रेवेन्यू ऑफिसर ने बिल की समीक्षा की। विभाग के अपने सिस्टम (लीजर स्टेटमेंट) ने स्वीकार किया कि बिलिंग गलत थी और बिल में ₹26,295 की कटौती (Correction) की गई।
बड़ा सवाल: विभाग की गलती का दंड उपभोक्ता क्यों भरे?
हैरानी की बात यह है कि विभाग ने मूल बिल तो कम कर दिया, लेकिन उस गलत बिलिंग की वजह से पिछले 15 सालों में चढ़ा हुआ ₹37,289 का ब्याज (DPS) कम करने से मना कर दिया है। उपभोक्ता का तर्क है कि जब मूल राशि ही गलत टैरिफ पर आधारित थी, तो उस पर ब्याज वसूलना डकैती के समान है।
अंधेरगर्दी: बिजली काटी, अंधेरे में परिवार
अपनी गलती सुधारने के बजाय विभाग ने उपभोक्ता का कनेक्शन ही काट दिया है। उपभोक्ता अनमोल कुमार का कहना है, “मेरे द्वारा अब तक ₹35,000 का भुगतान किया जा चुका है, जिसका विभाग ने कोई समायोजन नहीं किया। अब मैं इस मामले को ‘लोक शिकायत निवारण’ और ‘बिजली नियामक आयोग’ के पास ले जा रहा हूँ।”
इन सवालों के घेरे में विभाग:
- रानीगंज का ग्रामीण इलाका ‘अर्बन’ श्रेणी में कैसे जुड़ा रहा?
- 15 साल तक आवेदनों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- जब बिलिंग गलत थी, तो विभाग अवैध ब्याज वापस क्यों नहीं ले रहा?
अररिया बिजली विभाग के इस कारनामे ने विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और विभाग के उच्च अधिकारी इस गरीब उपभोक्ता को न्याय दिलाते हैं या लापरवाही का यह खेल ऐसे ही जारी रहेगा।


















