नजरिया न्यूज़, बिहार।
बिहार के गांवों की मिट्टी में संघर्ष की खुशबू बसती है। यहीं से निकलते हैं वे सपने, जो अभावों के बीच पनपते हैं और मेहनत की धूप में पककर इतिहास रचते हैं। एक मजदूर का बेटा, सब्जी बेचने वाले का बेटा या रिक्शा चलाने वाले का बेटा—जब आईएएस बनता है, तो यह केवल एक व्यक्ति की सफलता नहीं होती, बल्कि लाखों आम लोगों की उम्मीदों का उत्सव बन जाती है। यह तस्वीर बताती है कि उम्मीद कभी मरती नहीं, हौसला कभी टूटता नहीं और जीवटता कभी कम नहीं होती।
गरीबी सपनों की दुश्मन नहीं होती। असली दुश्मन होता है डर—हार मान लेने का डर। जिन घरों में साधन कम होते हैं, वहां सपने अक्सर बड़े होते हैं। वहां बच्चे आधी रोटी में पढ़ाई करते हैं, मिट्टी के आंगन में बैठकर किताबों से दोस्ती करते हैं और अंधेरी रातों में भी उजाले का रास्ता ढूंढ लेते हैं। यही वह तपस्या है, जो कठिनाई भरे रास्तों को पार कराकर सफलता तक पहुंचाती है।
प्रतिभा पैसों की गुलाम नहीं होती। वह न तो महंगे स्कूलों की मोहताज है और न ही मुट्ठी भर साधन-संपन्न लोगों की। प्रतिभा तो स्वच्छंद होती है—जहां थोड़ी सी जमीन मिली, वहीं उग आती है और समय के साथ वटवृक्ष बन जाती है। गांव के सरकारी स्कूल, पुराने नोट्स, सीमित संसाधन और अनगिनत असफलताएं—इन सबके बीच भी जो डटा रहता है, वही मंज़िल पाता है।
आईएएस बनने की यात्रा आसान नहीं। यह वर्षों की मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास की परीक्षा है। कई बार असफलताएं मिलती हैं, पर हर ठोकर आगे बढ़ने का सबक बन जाती है। परिवार अपने हिस्से का सुख त्याग देता है—खुद अभाव में जीता है, पर बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का सपना आंखों में संजोए रखता है। यही सपना दिन-रात मेहनत में बदलता है और धीरे-धीरे हकीकत की ओर कदम बढ़ाता है।
जब यह सपना साकार होता है, तो केवल एक घर नहीं रोशन होता—पूरा समाज रोशन होता है। गांव के बच्चे नए सपने देखने लगते हैं, माता-पिता का भरोसा मजबूत होता है और देश को ईमानदार नेतृत्व की उम्मीद मिलती है। बिहार की धरती बार-बार साबित करती है कि संघर्ष से जन्मी सफलता सबसे मजबूत होती है। यही संदेश है—सपने देखिए, डटे रहिए, क्योंकि मेहनत का फल अवश्य मिलता है।






















