जोगबनी (नजरिया न्यूज़)।
लोकतंत्र में पत्रकारों को चौथा स्तंभ माना जाता है, लेकिन नेपाल के कोशी प्रदेश में सरकार द्वारा लाया गया एक प्रस्तावित विधेयक इस स्तंभ को कमजोर करने की ओर संकेत करता है। इस विधेयक के तहत किसी भी समाचार पर आपत्ति दर्ज करवाने पर डेढ़ लाख रुपये तक का जुर्माना लगाए जाने का प्रावधान है। इस प्रस्ताव के विरोध में राजधानी विराटनगर सहित पूरे प्रदेश के पत्रकार सड़क पर उतर आए। शांतिपूर्ण धरना दे रहे पत्रकारों पर पुलिस ने बल प्रयोग किया, लाठियां बरसाईं और उन्हें घसीटकर थाने तक ले गई। इस घटना ने न केवल नेपाल बल्कि भारत के सीमावर्ती इलाकों में भी रोष पैदा कर दिया है।
विधेयक से पत्रकारों की स्वतंत्रता पर संकट
कोशी प्रदेश सरकार ने “आम संचार व्यवस्था विधेयक” संसद में पेश किया है। इसमें स्पष्ट उल्लेख है कि किसी भी समाचार को लेकर यदि कोई व्यक्ति, संस्था या पक्ष आपत्ति दर्ज कराता है, तो संबंधित पत्रकार या मीडिया हाउस पर डेढ़ लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा। इसे पत्रकार समाज ने सीधा-सीधा अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला बताया है। उनका कहना है कि यह विधेयक मीडिया को डराने और दबाव में रखने का हथकंडा है।
विराटनगर में बड़ा आंदोलन
विधेयक की जानकारी मिलते ही कोशी प्रदेश की राजधानी विराटनगर में पत्रकारों ने एकजुट होकर धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया। संसद भवन परिसर में संसदीय पत्रकार मंच और नेपाल पत्रकार महासंघ के सदस्य शांतिपूर्वक धरना दे रहे थे। उनका कहना था कि उनकी मांग केवल सरकार तक संदेश पहुँचाने की है। लेकिन प्रदेश सरकार ने उनकी आवाज़ दबाने के लिए पुलिस को भेज दिया। पुलिस ने पत्रकारों को जबरन घसीटा और बल प्रयोग कर उन्हें सभा भवन से बाहर निकाल दिया।
पुलिसिया कार्रवाई से मचा बवाल
धरना स्थल पर पुलिस और पत्रकारों के बीच झड़प की स्थिति उत्पन्न हो गई। कई पत्रकारों को चोटें भी आईं। संसद भवन के गेट से बाहर निकाले जाने के बाद भी पत्रकार पीछे नहीं हटे। वे एकजुट होकर गेट के सामने बैठ गए और नारेबाजी करने लगे। पुलिस ने यहां भी उनसे दुर्व्यवहार किया और उन्हें तितर-बितर करने की कोशिश की।
आंदोलन में प्रमुख पत्रकारों की भागीदारी
इस धरने में नेपाल पत्रकार महासंघ कोशी प्रदेश के अध्यक्ष भरत खड्का, उपाध्यक्ष कुमोद अधिकारी, महासचिव हिमा चेम्जोंग, सचिव ध्रुव भट्टराई, अरविंद मेहता जैसे वरिष्ठ पत्रकार मौजूद थे। संसदीय पत्रकार मंच कोशी के अध्यक्ष कुमार लुइँटेल, प्रेस सेंटर कोशी के महासचिव गोकुल पराजुली, प्रेस यूनियन के पूर्व उपाध्यक्ष लिलाबल्लभ घिमिरे, प्रेस सेंटर नेपाल के केंद्रीय सदस्य अर्जुन आचार्य, उपाध्यक्ष सुजाता लिम्बू, समाजवादी प्रेस संगठन के उत्तम पोखरेल, फोनिज मोरंग के अध्यक्ष अनिल श्रेष्ठल, पत्रकार श्याम सुंदर सूतिहार और मुकेश यादव सहित बड़ी संख्या में पत्रकार आंदोलन का हिस्सा बने।
सरकार के खिलाफ बढ़ा आक्रोश
पत्रकार संगठनों का कहना है कि सरकार उनकी आवाज़ दबाने का प्रयास कर रही है। उनका कहना है कि यदि यह विधेयक पारित होता है तो पत्रकारिता का पूरा अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। मीडिया संस्थानों पर आर्थिक दबाव डालकर सरकार चाहती है कि केवल उसकी पसंद की खबरें ही प्रकाशित हों।
बिहार तक पहुंचा विरोध
कोशी प्रदेश में हुई इस घटना का असर भारत के सीमावर्ती जिलों तक देखा गया। बिहार के अररिया, किशनगंज, सुपौल आदि क्षेत्रों के पत्रकार संगठनों ने इस पुलिसिया कार्रवाई की भर्त्सना की। उनका कहना है कि लोकतंत्र में मीडिया की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रयास किसी भी देश के लिए घातक है। भारतीय पत्रकारों ने नेपाल सरकार से इस प्रस्तावित विधेयक को तुरंत वापस लेने की मांग की है।
लोकतंत्र और मीडिया पर प्रश्नचिह्न
लोकतंत्र में प्रेस और मीडिया की भूमिका जनता की आवाज़ को सामने लाना है। यदि उन पर जुर्माना और दंड का डर होगा तो स्वतंत्र पत्रकारिता संभव ही नहीं रह जाएगी। कोशी प्रदेश की सरकार का यह कदम न केवल नेपाल में बल्कि पड़ोसी देशों में भी लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल खड़ा कर रहा है।
पत्रकार संगठनों की चेतावनी
नेपाल पत्रकार महासंघ और संसदीय पत्रकार मंच ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि यह विधेयक वापस नहीं लिया गया तो आंदोलन और भी उग्र होगा। उनका कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए वे किसी भी हद तक संघर्ष करने को तैयार हैं।
निष्कर्ष
नेपाल के कोशी प्रदेश में प्रस्तावित यह विधेयक लोकतंत्र की बुनियाद पर सीधा प्रहार माना जा रहा है। पत्रकारों के कलम और कैमरे को रोकने की कोशिश केवल सरकार की असहजता को दर्शाती है। जिस प्रकार से शांतिपूर्ण धरना दे रहे पत्रकारों पर लाठीचार्ज हुआ, उसने सरकार की मंशा पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। लोकतंत्र तभी मजबूत रहेगा जब पत्रकारिता स्वतंत्र और निष्पक्ष रहेगी। इसलिए पत्रकारों की मांग जायज़ है और सरकार को चाहिए कि इस विधेयक को तुरंत वापस लेकर लोकतंत्र की गरिमा को बनाए रखे।























