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भीमराव अंबेडकर जयंती :बाबा साहेब के संविधान से छेड़छाड़ करके हजारों करोड़ बनाने वालों को मुंह की खानी पड़ी : हरीराम बनवासी

भीमराव अंबेडकर जयंती :बाबा साहेब के संविधान से छेड़छाड़ करके हजारों करोड़ बनाने वालों को मुंह की खानी पड़ी : हरीराम बनवासी

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भीमराव अंबेडकर जयंती :बाबा साहेब के संविधान से छेड़छाड़ करके हजारों करोड़ बनाने वालों को मुंह की खानी पड़ी : हरीराम बनवासी

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April 14, 2024
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भीमराव अंबेडकर जयंती :बाबा साहेब के संविधान से छेड़छाड़ करके हजारों करोड़ बनाने वालों को मुंह की खानी पड़ी : हरीराम बनवासी
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  • डॉ. आंबेडकर ने एक लक्ष्य को ध्यान में रखकर क़ानून की पढ़ाई की थी और ऐसा संविधान दिया है जिससे छेड़छाड़ करने के लिए 370 के पार सांसद चाहिए
  • प्रधानमंत्री बनने के लिए 272 सांसदों का ही समर्थन चाहिए: हरीराम वनवासी
  • खाने पर पैसे ख़र्च ना हों, ये सोच कर वे कई बार भूखे रह जाते थे, लेकिन पढ़ाई पर उनका पूरा ध्यान लगा रहता: हरीराम वनवासी
  • 1923 में लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स ने उनकी थीसिस को मान्यता दी और उन्हें डॉक्टर ऑफ़ साइंस की उपाधि से सम्मानित किया,एक ही वर्ष में वे डॉक्टर और बैरिस्टर बन गए थे

सीताराम राही, स्वतंत्र पत्रकार, 14अप्रैल। भारत के संविधान से इलेक्ट्रोल बॉन्ड कानून बनाकर हजारों करोड़ रुपये चंदा लेने वाले कानून को मुंह की खानी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति नियुक्ति के लिए भी बाबा साहब के संविधान से छेड़छाड़ किया गया था। इस कानून को भी मुंह की खानी पड़ी। संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकार से छेड़छाड़ कोई नहीं कर सकता। यह बात वनवासी समाज के नेता और सोशल एक्टिविस्ट हरीराम वनवासी ने कही। वे अंबेडकर सेवा संस्थान मझिगवां में वक्ताओं के विचारों को सुनने के बाद पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। शुभारंभ में भारत रत्न बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर जयंती के अवसर पर माल्यार्पण के बाद बुद्धिजीवियों ने अपने -अपने विचार किए।
डॉ. हरीराम वनवासी ने कहा बाबा साहेब भीमराव राव अम्बेडकर अपने के समय के सबसे अधिक पढ़े-लिखे महान विभूति थे। किताब खरीदना और पढ़ना उनकी दिनचर्या में शामिल था। महापरिनिर्वाण के दिन जब बाबा साहब हम लोगों को संविधान की रक्षा का दायित्व छोड़कर गए तो उनका घर पुस्तकालय में तब्दील हो चुकी था। 35000 पुस्तकें बाबा साहब के घर पर पर थीं। उनका घर पुस्तकों को पढ़ने के लिए सभी के लिए खुला रहता था। लेकिन,कैप्शन: लंदन में अंबेडकर हाउस का बाहरी नजारा -फाइल फोटो

उनका घर ले जाने की अनुमति किसी को नहीं थी।
उन्होंने अजीवन अछूत मिटाने लक्ष्य पर काम किय।उन्होंने वकालत का पेशा पेशेवर उत्कृष्टता या उन्नति के लिए नहीं चुना बल्कि, उस दौर में भारत के लगभग छह करोड़ अछूतों और दबे-कुचले दलितों को न्याय दिलाने के लिए चुना था।

देश की आज भी सबसे गरीब जाति मुसहर समाज के राष्ट्रीय कार्यकर्ता हरीराम वनवासी ने कहा:
14 अप्रैल की उनकी जन्मतिथि के मौके पर हम आपको बताते हैं कि वे वकील कैसे बने और उन्होंने अपने मुवक्किलों के लिए कौन से प्रमुख मामले में पैरवी की और उन मामलों का नतीजा क्या रहा। *हरीराम वनवासी ने कहा:*
किसी का पक्ष लेना और उसे ठीक से प्रस्तुत करना आम बोलचाल की भाषा में ‘किसी की वकालत करना’ कहलाता है। भारतीय संविधान के निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर एक जाने माने वकील भी थे।उन्होंने न केवल अपने मुवक्किलों के लिए वकालत की बल्कि समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के लोकतांत्रिक मूल्यों की भी वकालत की।इसलिए, उनकी गिनती आज भी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ वकीलों में होती है।
1913 में बाबा साहेब बॉम्बे के एलफिंस्टन कॉलेज से स्नातक करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय चले गए थे।इसके लिए उन्हें बड़ौदा के सयाजीराव गायकवाड़ महाराज से आर्थिक मदद मिली थी।

*भारत का राष्ट्रीय लाभांश’ थीसिस की प्रस्तुति:*

*हरीराम वनवासी ने कहा:*
आर्थिक मदद के बदले में उन्हें बड़ौदा के राजपरिवार के साथ एक अनुबंध करना पड़ा था कि अमेरिका में पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें बड़ौदा सरकार के अधीन नौकरी करनी पड़ेगी।

साल 1913 में बाबा साहब अमेरिका पहुंचे। अमेरिका में उनका परिचय दुनिया भर के विभिन्न विचारकों और उनकी विचारधाराओं से हुआ। उससे उनके सामने जीवन का लक्ष्य स्पष्ट हो गया।
अमेरिका में पढ़ाई के दौरान कई जगहों पर इस बात का ज़िक्र मिलता है कि वे 18-18 घंटे तक पढ़ाई किया करते थे।इस अवधि के दौरान उन्होंने अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, एथिक्स और मानवविज्ञान का अध्ययन किया। 1915 में ‘भारत का प्राचीन व्यापार’ विषय पर थीसिस प्रस्तुत करने के बाद एमए की डिग्री हासिल की।1916 में उन्होंने ‘भारत का राष्ट्रीय लाभांश’ थीसिस प्रस्तुत की।

कैप्शन अमेरिका में बाबा साहेब की प्रतिमा का अनावरण -फाइल फोटो

*पढ़ने और जानने की भूख बढ़ती जा रही थी:*
हरीराम वनवासी ने कहा: डॉ. आंबेडकर जितना पढ़ रहे थे, उतना ही उनके पढ़ने और जानने की भूख बढ़ रही थी। उन्होंने बड़ौदा के महाराज सायाजीराव गायकवाड़ से आगे की पढ़ाई करने की अनुमति मांगी। उन्हें वह अनुमति मिल भी गई।

इसके बाद वो अर्थशास्त्र और क़ानून की उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए लंदन पहुंचे। उन्होंने अर्थशास्त्र में शिक्षा के लिए लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनामिक्स में दाख़िला लिया, जबकि क़ानून की पढ़ाई के लिए ग्रेज़ इन में नामांकन लिया।

1917 में, बड़ौदा सरकार की छात्रवृत्ति समाप्त हो गई और अफ़सोस के साथ उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। इस बीच उनके परिवार को आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था।इस स्थिति को देखते हुए ही आंबेडकर ने भारत लौटने का फ़ैसला लिया था।

अनुबंध के मुताबिक उन्होंने बड़ौदा सरकार के लिए काम करना शुरू कर दिया।वहां उन्हें अन्य कर्मचारियों से अत्यधिक जातिगत भेदभाव सहना पड़ता था।यहां तक ​​कि बड़ौदा में रहने के लिए जगह ढूंढने में भी उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ा था।फिर उन्होंने बंबई वापस लौटने का फ़ैसला किया।

बड़ौदा सरकार के साथ काम करने के अपने अनुभव के बारे में आंबेडकर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ”मेरे पिता ने मुझे पहले ही कह दिया था कि इस जगह काम मत करना। शायद उन्हें इस बात का अंदाज़ा था कि वहां मेरे साथ कैसा व्यवहार होगा।

*लोकप्रिय प्रोफेसर:*
वर्ष 1917 के अंत में आंबेडकर साहेब बंबई पहुंचे।वहां उन्होंने सिडेनहैम कॉलेज में प्रोफ़ेसर पद के लिए आवेदन किया।
कहने की ज़रूरत नहीं है कि वे वहां जल्दी ही लोकप्रिय प्रोफ़ेसर हो गए।वे हमेशा बड़ी तैयारी के साथ पढ़ाने के लिए जाते थे। उनकी तैयारी ऐसी होती थी कक्षा से बाहर के छात्र भी उनके लेक्चर सुनने के लिए आते थे।

*अछूत समाज के शुरू किया काम:*

एक्टिविस्ट हरीराम वनवासी ने बताया कि 1919 में उन्होंने अछूत समाज की मुश्किलों को लेकर कमीशन के सामने अपना विचार प्रस्तुत किया। इस मौके पर उनकी प्रतिभा की झलक सबको दिखी।1920 में उन्होंने अछूतों की दुर्दशा को दुनिया के सामने लाने के उद्देश्य से ‘मूकनायक’ समाचार पत्र की शुरुआत की और आधिकारिक तौर पर एक तरह से अछूतों की वकालत शुरू की।
*हरीराम वनवासी कहते हैं:*
चूंकि सिडेनहैम कॉलेज की नौकरी सरकारी थी, इसलिए उन पर कई तरह की पाबंदियां भी थीं। इसके चलते ही उन्होंने 1920 में प्रोफ़ेसर पद से त्यागपत्र दे दिया और सीधे दलित मुक्ति के संघर्ष में कूद पड़े।
“” “”बताते चलें कि हरीराम वनवासी की भी नौकरी सरकारी थी। उनको कार्य करने में प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता था लेकिन सरकारी नौकरी की चिंता हरीराम वनवासी ने नहीं की मुसहर समाज के लिए काम करते रहे। इसके लिए उन्हें सरकारी नौकरी से हाथ धोना पड़ा।””
*हरीराम वनवासी कहते हैं:*

1920 में मानगांव में जाति बहिष्कृत वर्गों का एक सम्मेलन आयोजित किया गया था। इसमें हिंसा भड़क गई थी। छत्रपति शाहूजी महाराज ने कहा था कि बाबा साहेब शोषितों और वंचितों के नेता होंगे और यह बाद में सच साबित हुआ।

*कानून की डिग्री लेने दूबारा लंदन पहुंचे बाबा साहब:*

डॉ. आंबेडकर को अब तक यह एहसास हो गया था कि दलितों से जुड़े मुद्दे बेहद जटिल हैं, इसलिए उस पर काम करने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर वकालत करनी होगी और विधायिका में भी उन मुद्दों को ठीक से उठाना होगा। यही सोच कर वे क़ानून की डिग्री हासिल करने दोबारा लंदन पहुंचे।

सितंबर, 1920 में लंदन पहुंचने से पहले ही वे भारत में दलित नेता के तौर पर पहचान बना चुके थे।यानी उन्हें अपनी चुनौती और भूमिका दोनों का एहसास था। इसलिए लंदन में रहने के दौरान उनका झुकाव कभी ड्रामा, ओपेरा, थिएटर जैसी चीज़ों के प्रति नहीं हुआ।वे अपना अधिकतम समय पुस्तकालय में बिताते थे।

क़िफायत से रहने के लिए लंदन में वे हमेशा पैदल चलते थे।खाने पर पैसे ख़र्च ना हों, ये सोच कर वे कई बार भूखे रह जाते थे। लेकिन पढ़ाई पर उनका पूरा ध्यान लगा रहता।

लंदन में बाबा साहेब आंबेडकर के रूममेट होते थे असनाडेकर। वे आंबेडकर से कहते, ”अरे आंबेडकर, रात बहुत हो गई है. कितनी देर तक पढ़ते रहोगे, कब तक जगे रहोगे? अब आराम करो. सो जाओ.”

लेफ्टिनेंट धनंजय कीर की लिखी डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर की जीवनी में इसका ज़िक्र मिलता है. आंबडेकर अपने रूममेट को जवाब देते, ”अरे, मेरे पास खाने के लिए पैसे और सोने के लिए समय नहीं है. मुझे अपना कोर्स जल्द से जल्द पूरा करना है. कोई दूसरा रास्ता नहीं है.”

इससे यह पता चलता है कि डॉ. आंबेडकर अपने लक्ष्य के प्रति कितने प्रतिबद्ध थे।

1922 में क़ानून के सभी पाठ्यक्रम पूरे करने के बाद, उन्हें ग्रेज़ इन में ही बार का सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया गया और आंबेडकर बैरिस्टर बन गये। यहां यह बताना आवश्यक है कि बाबा साहेब ने एक ही समय में दो पाठ्यक्रम पूरे किए थे।

ग्रेज़ इन में कानून की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एलएसई) में उच्च अर्थशास्त्र की डिग्री भी हासिल की। 1923 में लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स ने उनकी थीसिस को मान्यता दी और उन्हें डॉक्टर ऑफ़ साइंस की उपाधि से सम्मानित किया।एक ही वर्ष में वे डॉक्टर और बैरिस्टर बन गए थे।

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