वैशाली: गर्मी के मौसम के आगमन के साथ ही बच्चों में खासकर एक वर्ष से पंद्रह वर्ष तक की आयु के बच्चों में होने वाले चमकी बुखार यानी एक्यूट एंसेफलाइटिस सिंड्रोम और जापानी इंसेफलाइटिस को लेकर स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह सतर्क हो गया है। संभावित खतरों को देखते हुए जिले में अभी से व्यापक तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। इसी क्रम में आज मंगलवार को सदर अस्पताल के प्रशासनिक भवन में एक विशेष प्रशिक्षण सत्र का आयोजन किया गया जिसमें प्रशिक्षकों को इस गंभीर बीमारी से निपटने के गुर सिखाए गए।
विशेषज्ञों की देखरेख में हुआ प्रशिक्षण सत्र का आयोजन
इस महत्वपूर्ण प्रशिक्षण सत्र की अध्यक्षता जिला वेक्टर बोर्न डिजीज नियंत्रण पदाधिकारी डॉक्टर गुड़िया कुमारी द्वारा की गई। प्रशिक्षण में मुख्य प्रशिक्षक के रूप में डीवीबीडीसीओ डॉक्टर गुड़िया कुमारी, डॉक्टर चंदन कुमार एवं डॉक्टर खुर्शीद महविश उपस्थित रहे। इस कार्यक्रम में जिले के सभी प्रखंडों से आए चिकित्सा पदाधिकारियों एवं दो-दो सीएचओ ने सक्रिय रूप से भाग लिया। प्रशिक्षण के दौरान विशेषज्ञों ने चमकी बुखार के लक्षणों और इसके उपचार के बारे में विस्तार से जानकारी साझा की। यह रेखांकित किया गया कि यह बीमारी मुख्य रूप से गर्मियों के मौसम में बच्चों को प्रभावित करती है, इसलिए समय रहते पहचान और प्राथमिक उपचार बेहद आवश्यक है।
निचले स्तर तक जागरूकता फैलाने का दिया गया निर्देश:
डॉक्टर गुड़िया कुमारी ने सभी प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारियों को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे अपने-अपने स्वास्थ्य संस्थानों के अधीन आने वाली सभी आशा कार्यकर्ताओं, एएनएम, जीएनएम, जीविका सदस्यों, पंचायत प्रतिनिधियों और शिक्षकों को चमकी बुखार के बारे में प्रशिक्षित करें। यह प्रशिक्षण उन चिकित्सा पदाधिकारियों और सीएचओ के माध्यम से दिया जाएगा जिन्होंने आज सदर अस्पताल में ट्रेनिंग प्राप्त की है। विभाग का मुख्य उद्देश्य है कि समाज के निचले स्तर तक इस बीमारी की पहचान और बचाव के तरीकों को पहुँचाया जाए ताकि किसी भी आपात स्थिति में बच्चे को त्वरित सहायता मिल सके।
लक्षणों की पहचान और बचाव के उपाय:
विभागीय जानकारी के अनुसार मस्तिष्क ज्वर या चमकी बुखार के प्रमुख लक्षणों में तेज बुखार आना जो पांच से सात दिनों से ज्यादा का हो, शरीर में चमकी होना अथवा हाथ पैर में थरथराहट होना, मानसिक संतुलन का ठीक न होना और शरीर के किसी खास अंग में लकवा मार जाना शामिल है। ऐसी स्थिति दिखने पर तत्काल गांव की आशा या एएनएम दीदी से संपर्क करना चाहिए और अविलंब निकटतम स्वास्थ्य केंद्र पर चिकित्सा परामर्श लेना चाहिए। विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि बच्चों को तेज धूप से बचाएं, उन्हें दिन में दो बार स्नान कराएं और रात में भरपेट खाना खिलाकर ही सुलाएं। इसके अलावा बच्चों को ओआरएस अथवा नमक-चीनी और नींबू पानी का शरबत पिलाते रहना चाहिए।
आपातकालीन स्थिति में तुरंत लें डॉक्टरी सहायता:
आपातकालीन स्थिति में मरीज को किसी भी प्रकार की देरी किए बिना अस्पताल पहुँचाना चाहिए क्योंकि चिकित्सकीय परामर्श में देरी मरीज की स्थिति को गंभीर बना सकती है। स्वास्थ्य विभाग ने सूचित किया है कि किसी भी आपातकालीन स्थिति में निःशुल्क एम्बुलेंस हेतु टोल फ्री नंबर एक सौ दो पर डायल किया जा सकता है। साथ ही स्वास्थ्य संबंधी तत्काल सेवा एवं शिकायत हेतु टोल फ्री नंबर एक सौ चार भी जारी किया गया है। अभिभावकों को विशेष रूप से सचेत किया गया है कि वे अंधविश्वास या ओझा-गुनी के चक्कर में समय नष्ट न करें और बच्चे की स्थिति बिगड़ने पर तुरंत डॉक्टर की सलाह लें।






















