-सिविल सर्जन ने जागरूकता रथ को दिखाई हरी झंडी; घर-घर जाकर संभावित मरीजों की पहचान और मुफ्त इलाज पर जोर
-60 वर्ष से ऊपर के बुजुर्गों और कुपोषितों की होगी विशेष जांच; सक्षम नागरिकों से ‘निक्षय मित्र’ बनने की अपील
-बीमारी को जड़ से मिटाने के लिए जनभागीदारी और सामुदायिक जागरूकता को बनाया जाएगा हथियार
शिवहर। विश्व यक्ष्मा दिवस के अवसर पर 100 दिवसीय टीबी मुक्त भारत अभियान फेज-2 का शुभारंभ सोमवार को किया गया। सिविल सर्जन सह प्रभारी सीडीओ डॉ दीपक कुमार ने टीबी मुक्त भारत अभियान की टीम के वाहन को हरी झंडी दिखाकर 100 दिवसीय टीबी मुक्त भारत अभियान फेज-2 का शुभारंभ किया। डॉ दीपक कुमार ने जानकारी दी कि टीबी के नए रोगियों की खोज हेतु जनभागीदारी एवं सामुदायिक जागरूकता के माध्यम से उक्त जोखिम युक्त जनसंख्या का टीबी स्क्रीनिंग किया जाना है, जिसका मुख्य उद्देश्य है कि टीबी रोग के मृत्यु दर को कम करना एवं नए रोगी जो टीबी के संक्रमण को फैला रहे हैं, उसकी रोकथाम करना।
अभियान के दौरान पिछले दो वर्ष से अबतक जो भी मरीज दवा खा चुके है, उनकी पहचान कर उनके परिवार के सदस्यों का जांच करवाया जाना है एवं एचआईवी ग्रसित, मधुमेह रोगियों, 60 वर्ष से ऊपर के व्यक्तियों, तम्बाकू/नशा करने वाले/कुपोषित व्यक्तियों को चिन्हित कर उनमें टीबी की सीबीनेट/ट्रू-नेट जांच करवाया जाना है। ताकि स-समय रोकथाम की जा सके। मौके पर स्वास्थ्य विभाग के सभी कर्मी के साथ साथ यक्ष्मा विभाग के सभी कर्मी उपस्थित थे।
टीबी एक गंभीर संक्रामक बीमारी है, इस बीमारी के चपेट में आने वाले लोगों की जान जोखिम में पड़ जाती है, लोगों को टीबी रोग के प्रति जागरूक करने एवं इससे सुरक्षित रखने के लिए हर साल 24 मार्च को विश्व यक्ष्मा दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को टीबी के बारे में जागरूक करना और इसके रोकथाम एवं इलाज के प्रति सजग बनाना है। विश्व यक्ष्मा दिवस महान वैज्ञानिक डॉ रॉबर्ट कोच की याद में मनाया जाता है, क्योंकि उन्होंने ही 24 मार्च 1882 को टीबी के बैक्टीरिया माइक्रो बैक्टीरियम ट्यूबरक्यूलोसिस की खोज की थी। टीबी एक गंभीर बीमारी है, लेकिन समय पर इलाज और सही देखभाल से इसे ठीक किया जा सकता है। इस बीमारी से हर साल लाखों लोग प्रभावित होते है, खासकर वे लोग जो कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली जूझ रहे होते है।
विश्व यक्ष्मा दिवस 2026 की थीम- हां! हम टीबी को खत्म कर सकते हैं:
यह थीम टीबी उन्मूलन के लिए देशों के नेतृत्व, सामाजिक भागीदारी, निरंतर निवेश और ठोस परिणामों को हासिल करने पर जोर देती है। इसका मतलब है कि हम सभी मिलकर प्रयास करें तो टीबी को हराया जा सकता है। इस थीम का मुख्य उद्देश्य लोगों को इस बीमारी के खिलाफ जागरूक करना और उन्हें इसके उन्मूलन के लिए प्रेरित करना है। टीबी के खिलाफ लड़ाई में सिर्फ सरकार ही नहीं बल्कि आम नागरिकों की भागीदारी भी जरूरी है। सही जानकारी, समय पर इलाज और लोगों की जागरूकता से ही इस बीमारी को खत्म किया जा सकता है।
क्या है तब रोग:
सिविल सर्जन डॉ दीपक कुमार ने बताया कि टीबी एक संक्रामक रोग है, जो मुख्यतः फेफड़ों को प्रभावित करती है। यह बीमारी माइक्रो बैक्टीरियम ट्यूबरक्यूलोसिस नामक बैक्टीरिया के कारण होती है। जब कोई संक्रमित व्यक्ति खांसता या छींकता है, तो यह बैक्टरी हवा में फैल जाता है और स्वस्थ्य व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर सकता है। टीबी को पहचानना आसान नहीं होता है। जिस घर टीबी के रोगी हैं उस घर के सभी सदस्यों का टीबी जांच करवाना आवश्यक है। ताकि समय रहते पता लगाया जा सके और टीबी को फैलने से रोका जा सके।
टीबी के इलाज में एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग किया जाता है, जो लगभग 6 से 9 महीने तक चलती है। इस दौरान दवा का नियमित सेवन बहुत जरूरी है क्योंकि बीच में दवा छोड़ देने पर बीमारी और भी गंभीर हो जाती है। जिससे मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी रोग हो जाती है।
टीबी रोग के लक्षण:
लगातार एक या दो हफ्ते से खांसी आना।
खांसी में कभी कभी खून आना।
वजन घटना।
भूख नहीं लगना।
तेज बुखार, रात में पसीना आना।
थकान महसूस होना और सांस लेने में तकलीफ होना।
इलाज के दौरान दी जाने वाली निक्षय पोषण योजना:
इलाज के दौरान पोषण के लिए रु 1000 प्रतिमाह रोगी को दी जाती है। दवा पहुंचाने या उपचार सहयोगकर्ता कार्यकर्ता को 1000 से 5000 तक प्रोत्साहन राशि दी जाती है। टीबी रोग का ज्यादा खतरा मलिन बस्तियों/कुपोषित बच्चों व व्यक्तियों/टीबी रोगियों के सभी घरवालों को/शुगर के मरीजों/एचआईवी पीड़ित व्यक्तियों को/60 वर्ष से ऊपर के व्यक्तियों को/ज्यादा धूम्रपान या तम्बाकू का उपयोग करने वाले व्यक्तियों के संक्रमित होने की संभावना अधिक होती है।
टीबी रोगी को सहयोग:
जिले के कोई भी सक्षम व्यक्ति/जनप्रतिनिधि/पदाधिकारीगण निक्षय मित्र बनकर टीबी रोगी को पोषण आहार का सहयोग कर सकते हैं। जिसके कारण टीबी मरीज जल्द ही स्वस्थ हो जाता है।






















