- एकाकी जीवन जीने वाले रतन टाटा को देश और दुनिया ने दी श्रद्धांजलि*
- रतन टाटा ने कूमी कपूर को दिए इंटरव्यू में स्वीकार किया था, “मेरे पिता क़ानून तोड़ने के हक़ में नहीं थे। इसलिए वो मेरे लिए ब्लैक में डॉलर नहीं ख़रीदते थे
- इसलिए अक्सर होता था कि महीना ख़त्म होने से पहले मेरे सारे पैसे ख़त्म हो जाते थे
कभी कभी मुझे अपने दोस्तों से पैसे उधार लेने पड़ते थे,कई बार तो कुछ अतिरिक्त पैसे कमाने के लिए मैंने बर्तन तक धोए….
अनिल उपाध्याय/अरुण सिंह, नजरिया न्यूज संवाददाता,100अक्टूबर।
टेटली, कोरस और जेगुआर का अधिग्रहण।शुरू में रतन टाटा की व्यावसायिक समझ पर लोगों ने कई सवाल उठाए।लेकिन सन 2000 में उन्होंने अपने से दोगुने बड़े ब्रिटिश ‘टेटली’ समूह का अधिग्रहण कर लोगों को चकित कर दिया। आज हमारे बीच नहीं रहे रतन टाटा की ग्लोबल बेवेरेजेस दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी चाय कंपनी है। इसके बाद उन्होंने यूरोप की दूसरी सबसे बड़ी इस्पात निर्माता कंपनी ‘कोरस’ को खरीदा।
आलोचकों ने इस सौदे की समझदारी पर सवाल उठाए लेकिन टाटा समूह ने इस कंपनी को लेकर एक तरह से अपनी क्षमता का प्रमाण दिया।सन 2009 के दिल्ली ऑटो एक्सपो में उन्होंने पीपुल्स कार ‘नैनो’ का अनावरण किया जो एक लाख रुपए की कीमत पर उपलब्ध थी।
नैनो से पहले 1998 में टाटा मोटर्स ने ‘इंडिका’ कार बाज़ार में उतारी थी जो भारत में डिज़ाइन की गई पहली कार थी।शुरू में ये कार असफल रही और रतन ने इसे फ़ोर्ड मोटर कंपनी को बेंचने का फ़ैसला किया।जब रतन डिट्रॉएट गए तो बिल फ़ोर्ड ने उनसे पूछा कि उन्होंने इस व्यवसाय के बारे में पर्याप्त जानकारी के बिना इस क्षेत्र में क्यों प्रवेश किया? 
फोटो परिचय:जेआरडी टाटा के साथ रतन टाटा (सबसे बाएं)…
उन्होंने टाटा पर ताना मारा कि अगर वो ‘इंडिका’ को ख़रीदते हैं तो वो भारतीय कंपनी पर बड़ा उपकार करेंगे।इस व्यवहार से रतन टाटा की टीम नाराज़ हो गई और बातचीत पूरी किए बिना वहां से चली आई।
एक दशक बाद हालात बदल गए और 2008 में फ़ोर्ड कंपनी गहरे वित्तीय संकट में फंस गई और उसने ब्रिटिश विलासिता की ‘जैगुआर’ और ‘लैंडरोवर’ को बेचने का फ़ैसला किया।
कूमी कपूर लिखती हैं, “तब बिल फ़ोर्ड ने स्वीकार किया कि भारतीय कंपनी फ़ोर्ड की लक्ज़री कार कंपनी खरीद कर उस पर बड़ा उपकार करेगी। रतन टाटा ने 2.3 अरब अमेरिकी डॉलर में इन दोनों नामचीन ब्रांड्स का अधिग्रहण किया।साधारण मज़दूर की तरह नीला ओवरऑल पहनकर करियर की शुरुआत सन 1962 में रतन टाटा ने जमशेदपुर में टाटा स्टील में काम करना शुरू करके किया।
गिरीश कुबेर लिखते हैं, “रतन जमशेदपुर में छह साल तक रहे जहाँ शुरू में उन्होंने एक शॉपफ़्लोर मज़दूर की तरह नीला ओवरऑल पहनकर अप्रेंटिसशिप की। इसके बाद उन्हें प्रोजेक्ट मैनेजर बना दिया गया। इसके बाद वो प्रबंध निदेशक एसके नानावटी के विशेष सहायक हो गए। उनकी कड़ी मेहनत की ख्याति बंबई तक पहुंची और जेआरडी टाटा ने उन्हें बंबई बुला लिया”।
इसके बाद उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में एक साल तक काम किया। जेआरडी ने उन्हें बीमार कंपनियों सेंट्रल इंडिया मिल और नेल्को को सुधारने की ज़िम्मेदारी सौंपी।रतन के नेतृत्व में तीन सालों के अंदर नेल्को (नेशनल रेडियो एंड इलेक्ट्रॉनिक्स) की काया पलट हो गई और उसने लाभ कमाना शुरू कर दिया। 1981 में जेआरडी ने रतन को टाटा इंडस्ट्रीज़ का प्रमुख बना दिया।हालांकि इस कंपनी का टर्नओवर मात्र 60 लाख था लेकिन इस ज़िम्मेदारी का महत्व इसलिए था, क्योंकि इससे पहले टाटा खुद सीधे तौर पर इस कंपनी का कामकाज देखते थे।
जेआरडी की तरह रतन टाटा को भी उनकी वक्त की पाबंदी के लिए जाना जाता था। वो ठीक साढ़े छह बजे अपना दफ़्तर छोड़ देते थे।।वो अक्सर चिढ़ जाते थे अगर कोई दफ़्तर से संबंधित काम के लिए उनसे घर पर संपर्क करता था।वो घर के एकांत में फ़ाइलें और दूसरे काग़ज़ पढ़ा करते थे।
कैप्शन: वर्ष 2009 में जगुआर लैंड रोवर के सीईओ डेविड स्मिथ के साथ रतन टाटा :फाइल फोटो
अगर वो मुंबई में होते थे तो वो अपना सप्ताहांत अलीबाग के अपने फार्म हाउस में बिताते थे। उस दौरान उनके साथ कोई नहीं होता था सिवाए उनके कुत्तों के। उनको न तो घूमने का शौक था और न ही भाषण देने का। उनको दिखावे से चिढ़ थी।
बचपन में जब परिवार की रोल्स-रॉयस कार उन्हें स्कूल छोड़ती थी तो वो असहज हो जाते थे। रतन टाटा को नज़दीक से जानने वालों का कहना है कि ज़िद्दी स्वभाव रतन की ख़ानदानी विशेषता थी जो उन्हें जेआरडी और अपने पिता नवल टाटा से मिली थी।
सुहेल सेठ कहते हैं, अगर आप उनके सिर पर बंदूक भी रख दें, तब भी वो कहेंगे, मुझे गोली मार दो लेकिन मैं रास्ते से नहीं हटूँगा.”
अपने पुराने दोस्त के बारे में बॉम्बे डाइंग के प्रमुख नुस्ली वाडिया ने मीडिया को बताया, “रतन एक बहुत ही जटिल चरित्र हैं।मुझे नहीं लगता कि कभी किसी ने उन्हें पूर्ण रूप से जाना है।वो बहुत गहराइयों वाले शख़्स हैं।निकटता होने के बावजूद मेरे और रतन के बीच कभी भी व्यक्तिगत संबंध नहीं रहे।वो बिल्कुल एकाकी हैं।”
कूमी कपूर अपनी किताब ‘एन इंटिमेट हिस्ट्री ऑफ़ पारसीज़’ में लिखती हैं, “रतन ने मुझसे खुद स्वीकार किया था कि वो अपनी निजता को बहुत महत्व देते हैं। वो कहते थे शायद मैं बहुत मिलनसार नहीं हूँ, लेकिन असामाजिक भी नहीं हूं।”
सन 1992 में इंडियन एयरलाइंस के कर्मचारियों के बीच एक अद्भुत सर्वेक्षण करवाया गया:
उनसे पूछा गया कि दिल्ली से मुंबई की उड़ान के दौरान ऐसा कौन सा यात्री है जिसने आपके किया। इसका कारण भी ढूंढने की कोशिश की गई तो पता चला कि रात टाटा अकेले वीआईपी थे जो अकेले चलते थे। उनके साथ उनका बैग और फ़ाइलें उठाने के लिए कोई असिस्टेंट नहीं होता था।
जहाज़ के उड़ान भरते ही वो चुपचाप अपना काम शुरू कर देते थे।उनकी आदत थी कि वो बहुत कम चीनी के साथ एक ब्लैक कॉफ़ी माँगते थे।
उन्होंने कभी भी अपनी पसंद की कॉफ़ी न मिलने पर फ़्लाइट अटेंडेंट को डाँटा नहीं था।रतन टाटा की सादगी के अनेक क़िस्से मशहूर हैं।
गिरीश कुबेर टाटा समूह पर चर्चित किताब ‘द टाटाज़ हाउ अ फ़ैमिली बिल्ट अ बिज़नेज़ एंड अ नेशन’ में लिखते हैं, ”जब वो टाटा संस के प्रमुख बने तो वो जेआरडी के कमरे में नहीं बैठे। उन्होंने अपने बैठने के लिए एक साधारण सा छोटा कमरा बनवाया। जब वो किसी जूनियर अफ़सर से बात कर रहे होते थे और उस दौरान कोई वरिष्ठ अधिकारी आ जाए तो वो उसे इंतज़ार करने के लिए कहते थे। उनके पास दो जर्मन शैफ़र्ड कुत्ते होते थे ‘टीटो’ और ‘टैंगो’ जिन्हें वो बेइंतहा प्यार करते थे.”।
”कुत्तों से उनका प्यार इस हद तक था कि जब भी वो अपने दफ़्तर बॉम्बे हाउस पहुंचते थे, सड़क के आवारा कुत्ते उन्हें घेर लेते थे और उनके साथ लिफ़्ट तक जाते थे। इन कुत्त्तों को अक्सर बॉम्बे हाउस की लॉबी में टहलते देखा जाता था जबकि मनुष्यों को वहाँ प्रवेश की अनुमति तभी दी जाती थी।
जब रतन के पूर्व सहायक आर वैंकटरमणन से उनके बॉस से उनकी निकटता के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था:
“मिस्टर टाटा को बहुत कम लोग करीब से जानते हैं।हाँ दो लोग हैं जो उनके बहुत करीब हैं, ‘टीटो’ और ‘टैंगो’, उनके जर्मन शैफ़र्ड कुत्ते। इनके अलावा कोई उनके आसपास भी नहीं आ सकता।”
मशहूर व्यवसायी और लेखक सुहेल सेठ भी एक किस्सा सुनाते हैं।
6 फ़रवरी, 2018 को ब्रिटेन के राजकुमार चार्ल्स को बकिंघम पैलेस में रतन टाटा को परोपकारिता के लिए ‘रौकफ़ेलर फ़ाउंडेशन लाइफ़टाइम अचीवमेंट’ पुरस्कार देना था। लेकिन समारोह से कुछ घंटे पहले रतन टाटा ने आयोजकों को सूचित किया कि वो वहाँ नहीं आ सकते क्योंकि उनका कुत्ता टीटो अचानक बीमार हो गया है। जब चार्ल्स को ये कहानी बताई गई तो उन्होंने कहा ये
असली मर्द की पहचान है।
गौरतलब है कि रतन की दादी नवाज़बाई टाटा ने उन्हें पाला।
टाटा की जवानी के उनके एक दोस्त याद करते हैं कि टाटा समूह के अपने शुरुआती दिनों में रतन को अपना सरनेम एक बोझ लगता था।
अमेरिका में पढ़ाई के दौरान ज़रूर वो बेफ़िक्र रहते थे क्योंकि उनके सहपाठियों को उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में पता नहीं होता था।
रतन टाटा ने कूमी कपूर को दिए इंटरव्यू में स्वीकार किया था, “उन दिनों विदेश में पढ़ने के लिए रिज़र्व बैंक बहुत कम विदेशी मुद्रा इस्तेमाल करने की अनुमति देता था। मेरे पिता क़ानून तोड़ने के हक़ में नहीं थे। इसलिए वो मेरे लिए ब्लैक में डॉलर नहीं ख़रीदते थे। इसलिए अक्सर होता था कि महीना ख़त्म होने से पहले मेरे सारे पैसे ख़त्म हो जाते थे।कभी कभी मुझे अपने दोस्तों से पैसे उधार लेने पड़ते थे।कई बार तो कुछ अतिरिक्त पैसे कमाने के लिए मैंने बर्तन तक धोए।
रतन सिर्फ़ 10 साल के थे जब उनके माता-पिता के बीच तलाक़ हो गया। जब रतन 18 वर्ष के हुए तो उनके पिता ने एक स्विस महिला सिमोन दुनोयर से शादी कर ली।
उधर उनकी माता ने तलाक़ के बाद सर जमसेतजी जीजीभॉय से विवाह कर लिया। रतन को उनकी दादी लेडी नवाज़बाई टाटा ने पाला।
रतन अमेरिका में सात साल रहे। वहाँ कॉर्नेल विश्वविद्यालय से उन्होंने स्थापत्य कला और इंजीनियरिंग की डिग्री ली। लॉस एंजिलिस में उनके पास एक अच्छी नौकरी और शानदार घर था,लेकिन उन्हें अपनी दादी और जेआरडी के कहने पर भारत लौटना पड़ा।
इस वजह से उनकी अमेरिकी गर्लफ़्रेंड के साथ उनका रिश्ता आगे नहीं बढ़ सका।रतन टाटा ताउम्र अविवाहित रहे।























