नजरिया न्यूज़, फारबिसगंज।
स्थानीय प्रोफेसर कॉलोनी स्थित पीडब्ल्यूडी परिसर में इंद्रधनुष साहित्य परिषद के तत्वावधान में आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह भारतेंदु हरिश्चंद्र की पुण्यतिथि तथा अररिया जिले के वयोवृद्ध साहित्यकार भोला पंडित प्रणयी के जन्मोत्सव का संयुक्त आयोजन श्रद्धा और साहित्यिक गरिमा के साथ संपन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी सेवी एवं द्विजदेनी क्लब के उपाध्यक्ष अरविन्द ठाकुर ने की।
कार्यक्रम की शुरुआत उपस्थित साहित्य प्रेमियों द्वारा भारतेंदु हरिश्चंद्र के चित्र पर श्रद्धा सुमन अर्पित कर की गई। इसके पश्चात परिषद के संस्थापक सचिव विनोद कुमार तिवारी ने साहित्यकार भोला पंडित प्रणयी के साहित्यिक अवदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि प्रणयी जी का जन्म 6 जनवरी 1936 को अररिया के समीप गीतवास में हुआ था। वे अररिया जिले से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका संवदिया के संस्थापक संपादक हैं तथा उनकी दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। बिहार सरकार द्वारा उन्हें प्रतिष्ठित नागार्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है।
श्री तिवारी ने कहा कि जिस प्रकार सुभाष स्टेडियम और खडगेश्वरी काली मंदिर अररिया की पहचान हैं, उसी प्रकार संवदिया पत्रिका भी जिले की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की चर्चित कहानी से प्रेरित होकर पत्रिका का नाम संवदिया रखकर प्रणयी जी ने उन्हें स्थायी श्रद्धांजलि अर्पित की है।
अध्यक्षीय संबोधन में अरविन्द ठाकुर ने भारतेंदु हरिश्चंद्र के साहित्यिक योगदान पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि वे आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह और हिंदी में आधुनिकता के प्रथम सशक्त रचनाकार थे। उनका रचनाकाल युग-संधि पर खड़ा था, जहां उन्होंने रीतिकाल की विकृत सामंती प्रवृत्तियों को त्यागकर स्वस्थ परंपरा को अपनाया और नवीनता के बीज बोए। उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य में आधुनिक काल का आरंभ भारतेंदु हरिश्चंद्र से ही माना जाता है।
उन्होंने आगे कहा कि भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में भारतेंदु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता और शासकों के अमानवीय शोषण को अपने साहित्य का प्रमुख विषय बनाया। हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उनका योगदान अतुलनीय है। ब्रिटिश राज की शोषक नीतियों पर प्रहार करने वाले उनके लेखन के कारण ही उन्हें ‘युग चारण’ की संज्ञा दी गई। भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 तथा निधन 6 जनवरी 1885 को वाराणसी में हुआ था।
कार्यक्रम में अशोक कुमार यादव, पलकधारी मंडल, मनीष राज, सूर्यानंद पासवान, गौरी यादव, गणेश दास सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।























