• बेगूसराय पोषण वितरण में अव्वल, सहरसा ने निजी क्षेत्र में पेश की मिसाल
• पूरे प्रदेश में अब तक कुल 9,692 फुड बास्केट का हो चुका है वितरण
पटना। बिहार को टीबी मुक्त बनाने की दिशा में राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग के निरंतर प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। प्रदेश में टीबी मरीजों को मुख्यधारा से जोड़ने और उन्हें बेहतर पोषण प्रदान करने के अभियान ने गति पकड़ ली है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, राज्य के कई जिलों ने मरीजों की सहायता और डेटा प्रबंधन में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर एक नई उम्मीद जगाई है।
बेगूसराय का ‘पोषण मॉडल’ बना राज्य की पहचान
राज्य के स्वास्थ्य परिदृश्य में बेगूसराय जिला एक नई मिसाल पेश कर रहा है। यहाँ न केवल मरीजों की पहचान की जा रही है, बल्कि 1,489 मरीजों को सीधे पोषण लाभ से जोड़कर उनके स्वास्थ्य सुधार पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। जिले में अब तक कुल 2,961 फुड बास्केट का वितरण इस बात का प्रमाण है कि ज़मीनी स्तर पर प्रशासनिक तत्परता से बड़े बदलाव संभव हैं। बेगूसराय का यह योगदान राज्य में सर्वाधिक है और यह अन्य जिलों के लिए प्रेरणा का केंद्र बना हुआ है।
सहरसा और जहानाबाद की प्रशासनिक सक्रियता
टीबी उन्मूलन के क्षेत्र में मरीजों की ‘सहमति’ प्राप्त करना एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है,
और सहरसा ने इसमें उत्कृष्ट कार्य किया है। जिले ने निजी क्षेत्र के 3,767 मरीजों में से लगभग सभी को सरकारी प्रक्रियाओं का हिस्सा बनाने में सफलता पाई है, जहाँ अब मात्र 38 मामले ही लंबित हैं। इसी तरह, सरकारी केंद्रों पर जहानाबाद (839 सहमति) और अरवल जैसे जिलों ने पेंडेंसी को न्यूनतम स्तर पर रखकर यह साबित किया है कि प्रभावी निगरानी से लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है।
बढ़ती जागरूकता और व्यापक जन-भागीदारी
आंकड़ों का सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि राज्य भर में अब तक 1.26 लाख से अधिक मरीजों ने उपचार और सहायता के लिए अपनी आधिकारिक सहमति दे दी है। निजी क्षेत्र में 72,157 और सरकारी अस्पतालों में 54,723 मरीजों का इस प्रक्रिया से जुड़ना यह दर्शाता है कि अब समाज में टीबी को लेकर जागरूकता बढ़ रही है और लोग सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं पर भरोसा जता रहे हैं। यह जन-भागीदारी अभियान की सफलता का मुख्य आधार बन रही है।
विभागीय समन्वय और भविष्य की राह
पूरे प्रदेश में अब तक कुल 9,692 फुड बास्केट का वितरण स्वास्थ्य विभाग की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जहाँ इलाज के साथ-साथ मरीज के पोषण को भी प्राथमिकता दी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि बेगूसराय और सहरसा जैसे जिलों की यह सक्रियता एक चेन रिएक्शन शुरू करेगी। यदि इसी ऊर्जा के साथ कार्य जारी रहा, तो टीबी मुक्त बिहार का संकल्प निश्चित रूप से पूर्ण होगा।























