बारसोई (कटिहार)
वर्तमान विधानसभा चुनाव उम्मीदवारों को पार्टी टिकट की असली कीमत समझा गई है। गठबंधन या पार्टी लाइन से हटकर निर्दलीय मैदान में उतरने वाले कई दिग्गज नेता जनता की कसौटी पर बुरी तरह फेल हो गए। जिन नेताओं का नाम कभी क्षेत्र में प्रभावी माना जाता था, टिकट कटते ही उनकी राजनीतिक जमीन खिसकती नजर आई। एनडीए गठबंधन के बागी उम्मीदवार वरुण कुमार झा और रोशन अग्रवाल तथा एमआईएम के बागी उम्मीदवार मुअज्जम हुसैन और मोहम्मद जिन्ना को आशा के अनुरूप बहुत कम मत प्राप्त हुआ है टिकट न मिलने के बाद पार्टी से नाराज़ होकर बागी बनने का फैसला उन्हें मंहगा पड़ा। 
निर्दलीय उम्मीदवार
चुनाव प्रचार के दौरान भी देखा गया कि जिन नेताओं ने दल बदलकर या निर्दलीय होकर चुनाव लड़ा, उनके प्रति लोगों का रुझान बेहद ठंडा रहा। जनता ने इन प्रत्याशियों को स्पष्ट संदेश दिया कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर क्षेत्रहित और स्थिर नेतृत्व को प्राथमिकता दी जाती है। नतीजा यह हुआ कि बागी उम्मीदवारों को न जनता का साथ मिला और न ही संगठन का। उधर पार्टी नेतृत्व ने भी अनुशासनहीनता और गुटबाज़ी के विरुद्ध अपने बागी नेताओं पर कार्रवाई की। कई नेताओं को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से छह वर्षों के लिए निष्कासित कर दिया गया। जो उनके राजनीतिक करियर के लिए एक बड़ा धक्का माना जा रहा है। यह निष्कासन न सिर्फ अपमानजनक रहा बल्कि इसने क्षेत्रीय राजनीति में उनका भविष्य भी धूमिल कर दिया है। 
निर्दलीय उम्मीदवार
चुनाव परिणामों ने यह भी साबित किया कि गठबंधन की रणनीति और पार्टी का सामूहिक नेतृत्व ही सफलता की कुंजी है। बागी होने की कीमत चुकाने वाले उम्मीदवार अब पछता रहे हैं कि यदि वे संगठन के निर्णय पर भरोसा करते तो शायद उनकी राजनीतिक स्थिति मजबूत बनी रहती। कुल मिलाकर, इस चुनाव ने साफ संदेश दिया है कि टिकट की नाराजगी में बागी बनना अब आसान रास्ता नहीं रहा—जनता और पार्टी, दोनों ने ऐसे नेताओं को कड़ा सबक सिखाया है।























