= यूरोप इस मानसिकता के साथ बड़ा हुआ है कि उसकी समस्या पूरी दुनिया की समस्या है, लेकिन दुनिया की समस्या यूरोप की समस्या नहीं है: एस जयशंकर, विदेशमंत्री, भारत सरकार
= यूरोप की समस्याओं के यूरोप की समस्याओं के समाधान में मैं भी समान रूप से दिलचस्पी रखता हूँ. लेकिन मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि दुनिया यूरोप के आगे भी है।आप इस सोच के साथ अपनी समस्या नहीं सुलझा सकते हैं कि यूरोप की समस्या ही मुख्य रूप से दुनिया की समस्या है। में मैं भी समान रूप से दिलचस्पी रखता हूँ. लेकिन मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि दुनिया यूरोप के आगे भी है।आप इस सोच के साथ अपनी समस्या नहीं सुलझा सकते हैं कि यूरोप की समस्या ही मुख्य रूप से दुनिया की समस्या है:प़ंडित जवाहरलाल नेहरू
अनिल उपाध्याय, नजरिया न्यूज ब्यूरो, जौनपुर, 23 अक्टूबर।
1948 में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, ”यूरोप की समस्याओं के समाधान में मैं भी समान रूप से दिलचस्पी रखता हूँ. लेकिन मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि दुनिया यूरोप के आगे भी है।आप इस सोच के साथ अपनी समस्या नहीं सुलझा सकते हैं कि यूरोप की समस्या ही मुख्य रूप से दुनिया की समस्या है।
नेहरू ने कहा था , ”समस्याओं पर बात संपूर्णता में होनी चाहिए। अगर आप दुनिया की किसी एक भी समस्या की उपेक्षा करते हैं तो आप समस्या को ठीक से नहीं समझते हैं। मैं एशिया के एक प्रतिनिधि के तौर पर बोल रहा हूँ और एशिया भी इसी दुनिया का हिस्सा है। वहीं पीएम नरेंद्र मोदी सरकार के मौजूदा विदेश मंत्री एस जयशंकर यूक्रेन पर रूस के हमले के मामले में भारत का पक्ष बहुत ही आक्रामक तरीक़े से रखते रहे हैं।2022 के जून महीने में एस जयशंकर ने स्लोवाकिया की राजधानी ब्रातिस्लावा में एक कॉन्फ़्रेंस में कहा था:
‘यूरोप इस मानसिकता के साथ बड़ा हुआ है कि उसकी समस्या पूरी दुनिया की समस्या है, लेकिन दुनिया की समस्या यूरोप की समस्या नहीं है।
गौरतलब है कि ब्राज़ील, रूस, इंडिया, चाइना और साउथ अफ़्रीका के गुट को ब्रिक्स कहा जाता था, लेकिन इस साल जनवरी में इस समूह का विस्तार हुआ और इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब के साथ यूएई भी शामिल हुए।
गौरतलब है कि ब्रिक्स को चीन और रूस के दबदबे वाला समूह माना जाता है।चीन, रूस और ईरान खुलकर पश्चिम विरोधी बातें करते हैं।
दूसरी तरफ़ सऊदी अरब, यूएई और मिस्र पश्चिम और चीन के बीच संतुलन बनाकर रखते हैं। मिसाल के तौर पर भारत और ब्राज़ील को छोड़कर सभी ब्रिक्स सदस्य चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी बीआरआई में शामिल हैं।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया का अध्ययन बताता है कि ब्राज़ील भले चीन की बीआरआई परियोजना में शामिल नहीं है, लेकिन 2022 में लूला डा सिल्वा के राष्ट्रपति बनने के बाद से संबंध गहरे हुए है। ब्राज़ील के कुल निर्यात का एक तिहाई चीन को होता है।लेकिन सभी ब्रिक्स सदस्य देशों में भारत एकमात्र देश है, जो पश्चिम से रणनीतिक साझेदारी मज़बूत कर रहा है और चीन से तनावपूर्ण संबंध को लेकर भी संतुलन बनाए हुए है।
भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका है और दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था चीन है।
पीएम मोदी* के समक्ष कितनी बड़ी चुनौती है:
भारत एक तरफ़ इंडो-पैसिफिक में चीन से मुक़ाबले के लिए क्वॉड में है तो दूसरी तरफ़ ब्रिक्स में भी है।ब्रिक्स और क्वॉड के लक्ष्य बिल्कुल अलग हैं। ब्रिक्स पश्चिम के प्रभुत्व को चुनौती देने की बात करता है और क्वॉड को चीन अपने लिए चुनौती के तौर देखता है।
हाल ही में चीन ने पाकिस्तान को ब्रिक्स में शामिल करने का समर्थन किया है। रूस ने भी तत्काल पाकिस्तान की सदस्यता का समर्थन कर दिया। लेकिन भारत भी ब्रिक्स का संस्थापक सदस्य है और बिना भारत के समर्थन के पाकिस्तान का गुट में आना आसान नहीं है।
विश्व की राजनीति पर नजर रगने वाली मीडिया का सबसे ताजा आकलन है कि भारत का ब्रिक्स और क्वॉड में होना विरोधाभासी तो लगता है, लेकिन पश्चिम को भी ये बात पता है कि भारत के ब्रिक्स में होने से उसे कोई नुक़सान नहीं है और रूस को भी पता है कि भारत के क्वॉड में होने से उसके हितों के साथ समझौता नहीं होगा।























