, = लोकसभा चुनावों में हरियाणा में दलितों ने कांग्रेस को वोट दिया था।कांग्रेस को सोचना चाहिए कि ऐसा क्या हुआ कि तीन महीने में ही दलित वोट उससे दूर हो गए…
दुर्केश सिंह, संपादकीय प्रभारी नजरिया न्यूज।
हरियाणा में कांग्रेस की हार क्यों हुई? एग्ज़िट पोल में कांग्रेस को न केवल जीतते हुए दिखाया गया था बल्कि 90 सीटों की हरियाणा विधानसभा में कांग्रेस को क़रीब 60 सीटें मिलने का दावा किया गया था।
हरियाणा में किसानों का मुद्दा हो या ‘अग्निवीर’ योजना, ऐसे कई मुद्दे थे, जिनकी वजह से बीजेपी सरकार के प्रति लोगों की नाराज़गी बताई जा रही थी.लेकिन विधानसभा चुनावों के नतीजों ने सियासी जानकारों से लेकर एग्ज़िट पोल तक को ग़लत साबित किया है।
यही नहीं हरियाणा में अपनी सरकार की वापसी का इंतज़ार कर रही कांग्रेस को इससे बड़ा झटका लगा है।आख़िर वो कौन सी वजहें रही हैं, जिसने राज्य में कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया?
वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सिंह मानते हैं, “इन नतीजों के पीछे सबसे बड़ी वजह रही है बीजेपी का माइक्रो मैनेजमैंट। इसे आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि हरियाणा में बीजेपी ने ग़ैर जाट वोटों को बड़ी चतुराई से साधा है। इसका असर यह हुआ है कि हुड्डा के गढ़ सोनीपत की पाँच में से चार सीटों पर कांग्रेस की हार हो गई.”।
सत्ता की राजनीति ने कांग्रेस और भाजपा का भेदभाव मिटा दिया
राहुल गांधी को कठोर निर्णय लेना होगा। कांग्रेस के उम्मीदवार भी भाजपा उम्मीदवार की तरह वोट मांगते समय नजर आए।कांग्रेस नेता कुमारी शैलजा को लेकर भी कई तरह की चर्चा चलती रही। यहां तक कहा जाने लगा कि कांग्रेस के कई नेताओं का ध्यान चुनावों से ज़्यादा, चुनाव जीतने के पहले ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थी।
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि इन चुनावों का सबसे बड़ा सबक यही है कि अति आत्मविश्वास कभी नहीं करना चाहिए।ज़ाहिर है, उनका निशाना कांग्रेस पर ही था।
हरियाणा में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच गठबंधन की बात चल रही थी लेकिन दोनों के बीच सीटों की साझेदारी पर सहमति नहीं बन पाई थी।इस तकरार का संदेश यह गया कि भाजपा और विपक्ष में कोई अंतर नहीं है। हरियाणा के निष्पक्ष मतदाताओं को कांग्रेस उम्मीदवारों की सोच भाजपाई जैसी दिखाई दी।
बीजेपी ने इस बार हरियाणा विधानसभा चुनाव में 25 सीटों पर अपने उम्मीदवार बदल दिए थे।इनमें 16 उम्मीदवारों ने जीत हासिल कर ली। बीजेपी अपनी पुरानी 27 सीटें बचा पाने में भी कामयाब रही है जबकि उसके क़रीब 22 नई सीटों पर जीत हासिल की है।
“कांग्रेस ने अपने किसी विधायक का टिकट नहीं काटा और उसके आधे उम्मीदवारों की हार भी हो गई। उम्मीदवारों को नहीं बदलना भी कांग्रेस के लिए बड़ा नुक़सान साबित हुआ है।
कहीं मुख्यमंत्री बनने की होड़ ने कांग्रेस को जीत से बाहर तो नहीं कर दिया। कांग्रेस को इस कमजोरी से बचना होगा: मीडिया का आकलन
साल 2019 में हरियाणा विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 90 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और उसे 40 सीटों पर जीत मिली थी।
इस बार बीजेपी ने 89 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। कांग्रेस को 2019 में 90 में 31 सीटों पर जीत मिली थी।इस साल हुए लोकसभा चुनावों में हरियाणा में कांग्रेस को 43 फ़ीसदी वोट मिले थे जबकि बीजेपी ने 46 फ़ीसदी वोट मिले थे. यानी दोनों प्रमुख दलों के बीच वोटों का अंतर काफ़ी कम रहा था।यही नहीं पिछले विधानसभा चुनावों के मुक़ाबले इस बार राज्य में आम आदमी पार्टी ने भी राज्य में अपने वोट बैंक में क़रीब एक फ़ीसदी का इज़ाफ़ा कर लिया है।
मसलन राज्य की आसंध विधानसभा सीट पर गिनती ख़त्म होने के बाद बीजेपी के उम्मीदवार को कांग्रेस से क़रीब 2300 से ज़्यादा वोट मिले हैं जबकि इस सीट पर बीएसपी को 27 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले हैं।
जानकार बताते हैं, “इसी साल हुए लोकसभा चुनावों में हरियाणा में दलितों ने कांग्रेस को वोट दिया था. कांग्रेस को सोचना चाहिए कि ऐसा क्या हुआ कि तीन महीने में ही दलित वोट उससे दूर हो गए।























