नजरिया सम्वाददाता बारसोई कटिहार।
100 वर्षों से भी अधिक समय से बारसोई बाजार क्षेत्र में स्थापित बड़ी दुर्गा माता यहां के लोगों के आस्था का मुख्य केंद्र बना हुआ है। बारसोई के लोगों का मानना है कि दुर्गा माता हर मुसीबत से यहां के लोगों की रक्षा करती रहती है। ग्राम देवता के रूप में मुख्य रक्षक बनकर बैठी है। मान्यता है कि माता दुर्गा हर किसी की मनोकामना पूर्ण करती है। यहां पर मन्नतें मांगने वाले की झोली कभी खाली नहीं रहती। वहीं शारदीय नवरात्र के समय यहां श्रद्धालुओं की अपार भीड़ होती है। बता दें कि नवरात्र के प्रथम दिन से ही यहां पूजा अर्चना आरंभ हो जाती है। प्रत्येक दिन सैकड़ो की संख्या में श्रद्धालु खासकर लड़कियां और महिलाएं संध्या आरती के समय आती है। जबकि सुबह भी पूजा अर्चना के बाद होने वाली आरती में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ होती है।
मंदिर का इतिहास
बुढ़े पुराने बताते हैं कि यहां के जमींदार अनंत लाल साह जिसे अंग्रेजो द्वारा दीवान जी की टाइटल दी गई थी। ने महानंदा नदी में बहकर आ रही लकड़ी की मेढ़ को पकड़ कर यहां रख लिया और तब से शरद ऋतु के समय प्रत्येक वर्ष पूजा अर्चना होती है। यहां बताना जरूरी है कि पहले बारसोई में दुर्गा पूजा के अवसर पर बहुत बड़ा मेला लगता था। और बड़े-बड़े शहरों से बड़ी-बड़ी दुकानें और सर्कस थिएटर इत्यादि आते थे। तथा लगभग एक महीने मेला लगता था। दीपावली के दो-तीन दिन पहले प्रतिमा का विसर्जन होता था। जो कि आज तक होता आ रहा है। परन्तु मेला चार से पांच दिन तक ही लगता है।
क्या कहते हैं पुजारी ।
इस संबंध में माता दुर्गा की पूजा करने वाले पुजारी गणेश जी तिवारी एवं पांडव पांडे का कहना है की माता बहुत ही जागृत है। थोड़ी सी भी भूल होने पर तुरंत एहसास कर देती है। साथ ही माता बड़ी दयालु भी है। माफी मांगने पर बड़ी-बड़ी गलतियों को माफ कर देती है। अगर दिल से सच्चा पश्चाताप हो तो माता अवश्य गलतियों को क्षमा कर देती है। पुजारी पांडव पांडे ने कहा कि 12 महीने सुबह शाम माता की सेवा होती है। और इसी क्रम में माता कितनी बार एहसास कर चुकी है कि मैं यहां उपस्थित हूं। मेरी पूजा अच्छे से करो। वहीं मालिन के रूप में अपनी सेवा देने वाली उर्मिला देवी ने का कहना है कि माता सबकी झोली खुशियों से भर देती है। साफ सफाई और झाड़ू लगाने मात्र से सारे गम और परेशानी दूर हो जाती है। माता बड़ी ही दिल वाली है इसलिए इसे बड़ी दुर्गा माता भी कहते हैं।
क्या कहते हैं प्रबंधक
मंदिर कमेटी के पदाधिकारी का कहना है कि पूजा तो वर्ष में एक बार होती है किंतु परंतु पूरे वर्ष माता का आकर्षण बना रहता है। और जब कभी भी मन में अशांति होती है तो माता के दर्शन कर लेने से मन पूरी तरह से शांत हो जाता है। और 10 दिन की पूजा में यहां प्रत्येक दिन माता के दरबार में बैठकर एक अजीब सी शांति का अनुभव होता है। इसके अलावा भी माता और मंदिर के दर्शन मात्र से परम शांति मिलती है। संजीव दास ने कहा कि जो कहीं लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी नहीं हो सकता वह शांति यहां सहज ही प्राप्त होती है। इस संबंध में अनिल कुमार, संजय साह इत्यादि सदस्यों ने कहा कि हम लोगों को प्रत्येक वर्ष पूजा करके बहुत आनंद आता है। बारसोई बाजार के लोग काफी सहयोग करते हैं और सभी के सहयोग से यहां एक अच्छा पूजा मंडप सजता है और लोग उत्सव मनाते हैं।
पत्थर की प्रतिमा की स्थापना का हो रही है व्यवस्था
माता शेरावाली की पूजा प्रत्येक वर्ष मिट्टी की बनी प्रतिमा ने होती है परंतु कोरोना काल से पहले यहां राजस्थान से खास संगमरमर की बनी पत्थर की प्रतिमा लाकर स्थापित करने पर विचार होने के साथ-साथ तैयारी भी होनी शुरू हो गई थी। परंतु अचानक बीच में कोरोना काल आ जाने से मामला तत्काल स्थगित हो गया है। परंतु जल्द ही यहां कभी ना विसर्जित होने वाली पत्थर की सुंदर प्रतिमा की स्थापना होगी।
मुख्य आकर्षण का केंद्र संध्या आरती
नवरात्र के समय यहां की संध्या आरती होती है जिसमें सैकड़ो की संख्या में श्रद्धालु हाथ में दीपक और पूजा की थाल लिए माता की आरती गाते हैं। और माता की आरती उतारते हैं। उक्त दृश्य देखने में बहुत ही अच्छा लगता है। और आरती सुनने के बाद मन पूरी तरह से प्रसन्न हो जाता है।























