राजेश कुमार शर्मा।नजरिया न्यूज। जोगबनी।
बारा जिले के जंगल में सैकड़ो वर्ष पुराने साढ़े 15 फिट मोटाई के भीम सखुवा को काठमांडू निजगढ फास्ट ट्रैक मार्ग के लिए बनने वाले टोल ब्रिज को लेकर भीम सखुवा को काटने का निर्णय किया गया था जिसको लेकर वृक्ष मानव के नाम से प्रसिद्ध पर्यावरण अभियंता सुरेश शर्मा के द्वारा इसके संरक्षण के लिए एक मुहिम चलाया गया था, जो कुछ ही घंटो मे राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मीडिया मे चर्चा का बिषय बन गया था जिसके बाद नेपाल सरकार के द्वारा काठमांडू स्थित वन अनुसंधान तथा प्रशिक्षण केन्द्र से प्रतीक पाण्डे के नेतृत्व में एक टीम के द्वारा डिवीजन वन कार्यालय बारा के सहयोग मे इस भीम सखुवा के अवस्था के विषय में टोमोग्राफी मशीन से बैज्ञानिक परिक्षण किया गया है । जिसका परिक्षण का बिस्तृत विवरण आना बांकी है।
भीम सखुवा को बचाने के लिए नेपाल ही नही भारत के भी कई पर्यावरण संरक्षण अभियंता के द्वारा चलायी जा रही है मुहिम
भीम सखुवा को बचाने के लिए नेपाल ही नही भारत के भी कई पर्यावरण संरक्षण अभियंता के द्वारा आवाज उठायी जा रही है। भारत के पर्यावरण संरक्षण के ओर से कार्य कर रही कई संघ, संस्था के द्वारा भीम सखुवा के सामने मौन सत्याग्रह करने तक की भी बात कह रहे है।
असम से आने वाली हाथियों का है पद मार्ग क्षेत्र
उत्तर बंगाल व अररिया जिले व पश्चिमांचल से सटे जिले के परिदृश्य में देखा जाए, तो इन जिले के ज्यादातर भाग जंगलों से घिरे हुए हैं। पूर्व में भारत नेपाल सीमा पर मेची नदी है,तो पश्चिम मे बारा जिले मे निजगढ जंगल बहुल क्षेत्र से गुजरी है। लेकिन विकास के नाम पर जंगल की कटाई होने से
इससे जंगल का कई भागों में विभाजन हो गया। सुरेश शर्मा बताते है कि जंगलों के अतिक्रमण से प्रभावित तो सभी तरह के जानवर हुए, लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित कोई जानवर हुआ, तो वह है हाथी। ऐसे अन्य जंगली जानवरों की जान भी आफत में है।
उन्होंने कहा कि हाथी टेरिटोरियल एनिमल की श्रेणी में नहीं, बल्कि माइग्रेटियर श्रेणी में आते हैं। यानी हाथियों को एक सीमित दायरे में घेर कर नहीं रखा जा सकता है। यह जंगल का पूरा इलाका हाथी सहित अन्य जंगली जानवरों का सुरक्षित स्थल है।























