बेतिया।
मधुबनी प्रखंड की रहने वाली सुनीता देवी के लिए कुछ साल पहले तक जीवन अत्यंत कष्टकारी हो गया था। फाइलेरिया के कारण बढ़ते पाँव की सूजन ने न केवल उन्हें शारीरिक पीड़ा दी, बल्कि समाज की उपेक्षा भी झेलनी पड़ी। लेकिन आज सुनीता की पहचान पूरी तरह बदल चुकी है। आज वह केवल एक पीड़ित नहीं, बल्कि एक ‘स्वास्थ्य योद्धा’ बनकर उभर रही हैं। सुनीता अब गाँव-गाँव जाकर लोगों को यह समझाती हैं कि जो दर्द उन्होंने झेला, वह कोई और न झेले। वे अपनी व्यथा को ही अब समाज की जागरूकता का हथियार बना चुकी हैं और उनके इस हौसले ने पूरे क्षेत्र में एक नई उम्मीद जगाई है।
पश्चिमी चंपारण जिले को वर्ष 2027 तक फाइलेरिया मुक्त करने का जो सपना स्वास्थ्य विभाग ने देखा है, उसकी असली ताकत सुनीता जैसे दर्जनों मरीज ही हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने इस बीमारी की गहराई को स्वयं सहा है और अब सीएचओ लीड पिएसपी के माध्यम से समाज को जगा रहे हैं। तमकुआ स्वास्थ्य केंद्र की टीम के साथ मिलकर इन मरीजों ने अस्पताल की चारदीवारी को छोड़कर सीधे समाज के बीच अपनी पैठ बनाई है। यही कारण है कि आज लोग फाइलेरिया जैसी बीमारी पर खुलकर बात करने लगे हैं और संक्रमण को छिपाने के बजाय उसका सामना कर रहे हैं।
रणनीति और सक्रियता से संक्रमण दर में आई भारी गिरावट
जिला वेक्टर जनित रोग नियंत्रण पदाधिकारी डॉ. हरेंद्र कुमार के अनुसार पिछले तीन वर्षों में जिले में संक्रमण की दर में उत्साहजनक गिरावट दर्ज की गई है। जिले के 14 प्रखंड अब उस चरण में पहुंच चुके हैं जहाँ बीमारी के प्रसार की जांच अंतिम और निर्णायक दौर में है। इस सफलता के पीछे स्वास्थ्य विभाग की वह दूरदर्शी सोच है जिसमें सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों को विशेष प्रशिक्षण देकर प्रभावित मरीजों के बीच से ही नेतृत्वकर्ता तैयार किए गए। विभाग अब दवाओं के छिड़काव और वितरण के साथ-साथ सीधे जनसंवाद पर जोर दे रहा है ताकि कोई भी पात्र व्यक्ति दवा सेवन से वंचित न रहे।
मधुबनी के दोनाहा क्षेत्र में बदलाव की कहानी घर-घर तक पहुँच गई है। वार्ड नंबर 11 में आंगनबाड़ी सेविका संगीता पासवान महिलाओं को जागरूक कर रही हैं, तो वहीं वार्ड सदस्य नगी लाल गुप्ता और आशा कार्यकर्ता ममता देवी के प्रयासों से करीब चार गाँवों में इस बीमारी से जुड़ी पुरानी भ्रांतियां अब जड़ से खत्म हो रही हैं। तमकुआ स्वास्थ्य केंद्र में तैनात पवन कुमार, अंजू कुमारी और पूजा भारती के सामाजिक नेतृत्व ने लोगों का सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति नजरिया ही बदल दिया है। उन्होंने न केवल लोगों को बीमारी से बचाव की दवा अपनी मौजूदगी में खिलाई, बल्कि 160 से अधिक ग्रामीणों को सीधे तौर पर इस मुहिम का सक्रिय हिस्सा बनाया है।
उपचार के साथ सामाजिक सुरक्षा और सम्मान की नई पहल
स्वास्थ्य विभाग की यह लड़ाई केवल दवा खिलाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह पीड़ितों को गरिमापूर्ण जीवन देने का एक मानवीय प्रयास भी है। विभाग अब प्रभावितों को विशेष देखभाल किट देकर खुद की सफाई और रुग्णता प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित कर रहा है। इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए गंभीर मरीजों को दिव्यांगता प्रमाणपत्र और पेंशन योजना से जोड़कर उन्हें आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा दिलाई जा रही है। इससे मरीजों के मन में व्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ा है और वे स्वयं को समाज की मुख्यधारा का हिस्सा महसूस कर रहे हैं।
सुनीता देवी जैसी योद्धाओं और समर्पित स्वास्थ्य कर्मियों का यह सामूहिक और जमीनी संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो तो किसी भी व्याधि को जड़ से मिटाया जा सकता है। विभागीय सक्रियता और जनभागीदारी का यह संगम बताता है कि 2027 तक जिले को फाइलेरिया मुक्त करने का लक्ष्य अब महज एक सरकारी आंकड़ा नहीं बल्कि एक आने वाली सच्चाई है।























