नजरिया न्यूज़, रानीगंज (अररिया)।
बिहार के अररिया जिले के रानीगंज प्रखंड अंतर्गत मझुवा पश्चिम पंचायत के मुखिया किशन शर्मा पर हुए कथित जानलेवा हमले और ₹2 लाख की लूट के मामले में नया मोड़ आ गया है। जहाँ एक ओर पुलिस ने मुखिया की शिकायत पर रानीगंज थाना कांड संख्या 229/26 के तहत संगीन धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की है, वहीं अब बचाव पक्ष की ओर से नामजद अभियुक्त अनिल किस्कू की पत्नी सुनीता देवी ने अररिया पुलिस अधीक्षक (SP) को एक लिखित आवेदन देकर इस पूरी घटना को “पूर्व-नियोजित और बनावटी” करार दिया है।
एसपी को दिए आवेदन में सुनीता देवी ने आरोप लगाया है कि मुखिया किशन शर्मा राजनैतिक रंजिश, धन और पद के प्रभाव का दुरुपयोग कर हीरानगर स्थित आदिवासी समाज की भूमि पर नाजायज दबाव बना रहे हैं। जब समाज ने इसका शांतिपूर्ण विरोध किया, तो उन्हें जमीनों से बेदखल करने और जेल भेजने की नीयत से यह पूरा केस रचा गया है।
सुनीता देवी ने मुखिया द्वारा जारी डिजिटल विजुअल्स (तस्वीरों और वीडियो) को आधार बनाकर एसपी के समक्ष 5 बड़े फॉरेंसिक और वैज्ञानिक विरोधाभास रखे हैं, जो इस केस को तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण बनाते हैं:
1. भौतिक नियम को चुनौती: शर्ट सुरक्षित, फिर अंदर त्वचा पर दो साफ कट्स कैसे?
मुखिया का दावा: अभियुक्तों ने चाकू और पारंपरिक हथियारों से पूरे शरीर और सीने पर जहाँ-तहाँ वार कर उन्हें लहूलुहान कर दिया।
एसपी को दिए आवेदन में तर्क: अभियुक्त की पत्नी सुनीता देवी ने तर्क दिया है कि घटना के तुरंत बाद बीच सड़क पर ली गई तस्वीरों में मुखिया जी की मैरून शर्ट सामने सीने और दोनों बाजुओं पर पूरी तरह सुरक्षित, बटन बंद और बिना फटी हुई है। अस्पताल की तस्वीर में दाहिने हाथ पर दो साफ और सीधे समानांतर कट्स दिख रहे हैं। विज्ञान के नियम के अनुसार, बिना शर्ट का कपड़ा फटे अंदर की त्वचा पर चाकू से दो सलीके के कट्स लग जाना पूर्णतः असंभव है। यह चोट कृत्रिम रूप से या स्वयं बनाई गई प्रतीत होती है।
2. ‘बुरी तरह लहूलुहान’ होने के दावे के बीच सूखी उंगलियां और साफ़ सड़क
मुखिया का दावा: कलाई पर वार होने से भारी रक्तस्राव हुआ और वे लहूलुहान हालत में जमीन पर गिरे पड़े रहे।
एसपी को दिए आवेदन में तर्क: घटनास्थल (सड़क) की तस्वीरों में जमीन पूरी तरह सूखी और साफ है, जहाँ खून का एक भी कतरा नहीं गिरा है। इसके अलावा, अस्पताल के वीडियो में मुखिया जी का दाहिना हाथ बाएं हाथ के घाव को पकड़े हुए है, लेकिन उनके दाहिने हाथ की उंगलियां और हथेली पूरी तरह सूखी और साफ हैं। इतने सक्रिय रक्तस्राव (Active Bleeding) के दावे के बीच उंगलियों का साफ रहना चिकित्सा विज्ञान के सिद्धांतों के परे है।
3. गोलियों की गूंज के बीच बैकग्राउंड में असीम शांति
मुखिया का दावा:आरोपियों ने भीड़ को डराने और दहशत फैलाने के लिए पिस्टल से कई राउंड हवाई फायरिंग की।
एसपी को दिए आवेदन में तर्क:घटनास्थल की मुख्य तस्वीर के ठीक पीछे (Background) साफ देखा जा सकता है कि खेत में एक गाय शांति से चर रही है और मेढ़ पर उसका चरवाहा अत्यंत सामान्य मुद्रा में बैठा हुआ है। यदि वहां सचमुच गोलियां चली होतीं या जानलेवा हमला हुआ होता, तो पशुओं और स्थानीय लोगों में भारी भगदड़ और भय का माहौल होता। चरवाहे की यह शांति साबित करती है कि वहां कोई फायरिंग नहीं हुई।
4. गंभीर चोट और ₹2 लाख की लूट के बीच ‘स्थिर फोटोशूट‘
मुखिया का दावा: वे गंभीर रूप से घायल थे और आरोपी पैसे छीनकर मोटरसाइकिल्स से फरार हो गए।
एसपी को दिए आवेदन में तर्क: वास्तविकता यह है कि घटना के तुरंत बाद, अस्पताल जाने से पहले, मुखिया जी बिना किसी शारीरिक कमजोरी या सहारे के, बिल्कुल स्थिर मुद्रा में नंगे पैर बीच सड़क पर खड़े होकर कैमरे के सामने तस्वीरें खिंचवा रहे थे। एक गंभीर रूप से घायल व्यक्ति आपातकालीन सहायता ढूंढने के बजाय सड़क पर स्थिर खड़े होकर फोटोशूट क्यों करवा रहा था और तस्वीरें खींचने वाला वह तीसरा व्यक्ति कौन था, यह बड़ी साजिश का हिस्सा है।
5. भूमि विवाद और महादलित समाज को प्रताड़ित करने का आरोप
एसपी को दिए आवेदन में तर्क:आवेदन के अनुसार, असली विवाद हीरानगर स्थित महादलित व आदिवासी समाज की भूमि पर अनुचित दबाव बनाने का है। गरीब समाज द्वारा शांतिपूर्ण विरोध किए जाने के कारण ही उन्हें आपराधिक मामले में फंसाने की नीयत से यह पूरा ताना-बाना बुना गया है।
मांग: उच्चस्तरीय फॉरेंसिक (FSL) और मेडिकल बोर्ड से जांच
पीड़ित अभियुक्त की पत्नी सुनीता देवी ने अररिया एसपी से करबद्ध प्रार्थना करते हुए चार प्रमुख मांगें रखी हैं:
1. पूरे मामले की जांच किसी वरिष्ठ पुलिस पदाधिकारी या विशेष फॉरेंसिक टीम (FSL) से कराई जाए।
2. मुखिया द्वारा घटना के समय पहनी गई मैरून शर्ट की फॉरेंसिक जांच कराई जाए कि उस पर चाकू के निशान या खून के धब्बे क्यों नहीं हैं।
3. मेडिकल बोर्ड गठित कर मुखिया के घावों की सूक्ष्म जांच कराई जाए कि ये घाव किसी हमले के हैं या फिर कृत्रिम रूप से (स्वेच्छा से अथवा प्रोस्थेटिक मेकअप के जरिए) तैयार किए गए हैं।
4. जब तक निष्पक्ष वैज्ञानिक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक उनके पति अनिल किस्कू एवं अन्य गरीब आदिवासी भाइयों के विरुद्ध किसी भी दमनकारी या दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई जाए।
निष्कर्ष : मामले में दोनों पक्षों की ओर से गंभीर दावे और प्रति-दावे किए जा चुके हैं। जहाँ मुखिया ने लिखित प्राथमिकी दर्ज कराई है, वहीं अभियुक्त पक्ष ने डिजिटल साक्ष्यों के जरिए वैज्ञानिक विसंगतियों की ओर इशारा किया है। अब देखना यह होगा कि रानीगंज पुलिस और जांच अधिकारी सुश्री प्रिया कुमारी इन भौतिक और तकनीकी विरोधाभासों के आलोक में जांच को किस वैज्ञानिक अंजाम तक पहुंचाते हैं।





















