नजरिया न्यूज़, अररिया। विकाश प्रकाश।
अररिया जिले में उत्पाद विभाग एक बार फिर सुर्खियों में है। रानीगंज मद्य निषेध थाना से जुड़ा रिश्वतखोरी का मामला सामने आने के बाद विभागीय कार्रवाई की धीमी गति और विवादित अधिकारियों को फिर से जिम्मेदारी सौंपे जाने से कई सवाल खड़े हो रहे हैं। मामला उस समय तूल पकड़ा जब सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें रानीगंज मद्य निषेध थाना के तत्कालीन थानाध्यक्ष, एक सहायक अवर निरीक्षक (सअनि) और एक महिला सिपाही पर शराब पीने के आरोप में पकड़े गए तीन व्यक्तियों को छोड़ने के एवज में रुपये की मांग और लेन-देन का आरोप लगाया गया।
बताया जा रहा है कि वायरल वीडियो में साफ तौर पर रिश्वत मांगने की बातचीत रिकॉर्ड है। सूत्रों के अनुसार पहले 15 हजार रुपये की मांग की गई, जो बाद में 11 हजार रुपये में तय हुई। वीडियो के सामने आते ही मामला पूरे जिले में चर्चा का विषय बन गया और उत्पाद विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे।
मामले की गंभीरता को देखते हुए उत्पाद अधीक्षक निरंजन कुमार झा ने तत्काल संज्ञान लेते हुए मद्य निषेध इंस्पेक्टर राहुल दूबे को जांच की जिम्मेदारी सौंपी। जांच के दौरान आरोपों की पुष्टि हुई और यह मामला सही पाया गया। इसके बाद उत्पाद अधीक्षक ने बड़ी कार्रवाई करते हुए तत्कालीन थानाध्यक्ष सहित अन्य संबंधित पदाधिकारियों को रानीगंज मद्य निषेध थाना से हटाकर अररिया सदर मद्य निषेध थाना में योगदान करने का निर्देश दिया। जांच रिपोर्ट तैयार कर पटना मुख्यालय भेज दी गई।
हालांकि, जांच रिपोर्ट पटना भेजे जाने के एक माह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद अब तक कोई ठोस विभागीय कार्रवाई सामने नहीं आई। न तो निलंबन की सूचना मिली और न ही किसी प्रकार की अनुशासनात्मक कार्रवाई की घोषणा हुई। इसके उलट, समय बीतने के बाद विभाग ने इन्हीं अधिकारियों में से एक को टीम बी का वरीय प्रभारी बना दिया। इसे लेकर विभागीय हलकों में नाराजगी और असंतोष देखा जा रहा है।
इस संबंध में कार्यालय अधीक्षक, मद्य निषेध अररिया द्वारा एक अधिसूचना जारी की गई है, जिसमें नए प्रभार की जानकारी दी गई है। अधिसूचना के बाद यह सवाल और गहरा गया है कि क्या उत्पाद विभाग केवल जांच के नाम पर खानापूर्ति कर रहा है।
उत्पाद विभाग से जुड़े एक व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जिस महिला दारोगा पर रुपये लेन-देन का आरोप लगा था, उसे पहले भी अररिया मद्य निषेध थानाध्यक्ष का प्रभार दिया गया था और अब उसे टीम बी का वरीय प्रभारी बना दिया गया है। इससे विभाग की नीयत और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग रहा है।
स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब रिश्वतखोरी जैसे गंभीर आरोपों में जांच में मामला सत्य पाया गया है, तो दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए थी। ऐसे मामलों में अगर आरोपी अधिकारियों को ही दोबारा जिम्मेदार पद दिए जाएंगे, तो आम जनता का भरोसा व्यवस्था से उठना स्वाभाविक है।
अब देखना यह होगा कि पटना मुख्यालय स्तर से इस मामले में कब और क्या निर्णय लिया जाता है। फिलहाल, उत्पाद विभाग की कार्रवाई और कार्यशैली पर सवाल बरकरार हैं और यह मामला जिले में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।























