अमरेन्द्र कुमार, फारबिसगंज, 27 नवंबर।
वॉलीवुड अभिनेता धर्मेन्द्र के निधन पर पूरे देश की आंखें नम थीं वहीं, फारबिसगंज जनपद के लोग कहीं अधिक शोकाकुल थे। दरअसल 70 के दशक में अमर कथा शिल्पी फणीश्वर नाथ रेणु की अमर कृति ‘ मैला आंचल ‘ पर आधारित धर्मेंद्र – जया भादुड़ी अभिनीत ‘ डाग्दर बाबू ‘ की जिले में शूटिंग चल रही थी । लोग फारबिसगंज के भट्टाबाड़ी में फिल्म की शुटिंग देखने और अपने चहेते हीरो की झलक पाने के लिए जोखिम उठा दीवार से लेकर पेड़ पर चढ़ गये थे। उस समय यहां के लोगों में उनकी दीवानगी थी।
मैला आंचल के नायक प्रशांत जो एक डॉक्टर था, उसकी भूमिका वे निभा रहे थे अर्थात मैला आंचल के डाग्दर बाबू की। उस वक्त वे यहां फारबिसगंज के सिख परिवार जोगिंदर आहूजा के पुत्र देशराज आहूजा के यहां ठहरे थे। स्व. देशराज आहूजा के पौत्र अंशू आहूजा के अनुसार उनकी दादी स्व. चन्नी देवी ने धर्मेंद्र को अपने हाथों से मक्के की रोटी और सरसों का साग खिलाया था।
सफ़ेद रंग के एंबेसडर में पर्दा लगाकर आनेवाले धर्मेन्द्र, जया भादुड़ी, और पद्मा खन्ना की यादें आज भी ताजा हैं।
सोमवार को उनके निधन की सूचना मिलते ही देर शाम यहां के गुरूद्वारे में अनेक सिखों ने माथा टेक अरदास के साथ श्रद्धांजलि अर्पित की। इनमें रणजीत कौर, जसमीत कौर, लता बुद्धि राजा, जसवीर आहूजा, दीप कौर,रिंकी आहूजा, मोनिका आहूजा मनीषा और अमरजीत कौर ने लोगों को बताया कि भले वे धर्मेंद्र को देखा नहीं लेकिन पीढ़ियों से धर्मेंद्र की परिवार में ठहरने की कहानियां सुनते आ रहे हैं। आज ऐसा लगता है जैसे कोई अपना बिछड़ गया ।
यहां के सिखों तो शोकाकुल हैं ही, जनमानस कहीं अधिक शोक संतप्त हैं। खासकर इस कसक के साथ कि धर्मेंद्र यहां आये डाग्दर बाबू की फिल्म की शुटिंग के लिए एक नायक की भूमिका भी निभा रहे थे लेकिन फिल्म पूरी न हो सकी ।
काश ! फिल्म बन गई होती। इस फिल्म को लेकर रेणु साहित्य के जानकार डॉ. अनुज प्रभात बताते हैं कि डाग्दर बाबू की कहानी पूरी तरह मैला आंचल से ली गई थी। युवा डॉक्टर प्रशांत का चरित्र,जो गांव की बदहाली,जातीय तनाव, गरीबी और सामाजिक रूढ़ियों के बीच सेवा का संकल्प लेता है उसे धर्मेंद्र जैसे अभिनेता ही जीवंत कर सकते थे जो हो न सका।
उन्होंने यह भी कहा – रेणु गांव सिर्फ एक भौगोलिक स्थान नहीं था, बल्कि भावनाओं, संघर्षों और सामाजिक बदलाव की एवं बदलाव की धरती रही है। धर्मेंद्र और जया उसी धरती को उतारने आये थे पर वह संसार कभी दर्शकों तक पहुंच नहीं पाया। कहते कहते डॉ. प्रभात की आंखें नम हो गई और आवाज भी भर्रा गई। उन्होंने भर्राई आवाज में कहा – धर्मेंद्र के जाने से लगता है कि डाग्दर बाबू की चर्चा सचमुच आज हमेशा के लिए बंद हो गई। पर यह भी सच है कि आज भी फारबिसगंज के लोग उस अधूरी फिल्म को पूरे दिल से याद करते हैं। रेणु को… धर्मेंद्र को.. ..उस मीट्टी को । धर्मेंद्र के निधन ने पूरे क्षेत्र में एक भावनात्मक लहर पैदा कर दी है। मिट्टी की महक लिए , रेणु की भाषा लिए, धर्मेंद्र और जया की उस जोड़ी को लिए जिसने गांव की कहानी को पर्दे पर उतारने का साहस किया था। धर्मेंद्र अब इस दुनिया से चले गए पर फारबिसगंज की यह स्मृति,यह अधूरी फिल्म हमेशा उन्हें याद करती रहेगी।
स्थानीय फिल्म कलाकार राम कुमार भगत ने कहा कि डाग्दर बाबू सिर्फ एक अधूरी फिल्म नहीं एक अधूरी धड़कन है धर्मेंद्र के निधन के बाद यह धड़कन और तेज गूंजने लगी है। ऐसा अभिनेता न पहले आया है,न आगे आयेगा। स्थानीय फिल्म जगत के फिल्म निर्देशक अमृत राज ने अपने संदेश में कहा कि डाग्दर बाबू का न बनना… और धर्मेंद्र – जया को इस फिल्म को लेकर परदे पर उतरा नहीं देखना यूं कहें फिल्म का अधूरा रह जाना आज रेणु जनपद के वैसी ही क्षति है जैसे धर्मेंद्र का इस संसार से चले जाना। जैसे धर्मेंद्र अब वापस नहीं आने वाले वैसे ही अधूरी फिल्म अब धर्मेंद्र को लेकर पूरी नहीं होने वाली। काश ! वे डाग्दर बाबू की भूमिका उतार जाते… ।























