श्रम कानून : पत्रकारों को नौकरी से निकालने से पहले 6 माह पूर्व नोटिस देना अनिवार्य: एमपी मिश्रा
दुर्केश सिंह, संपादकीय प्रभारी नजरिया न्यूज 23नवंबर।
अब सभी पत्रकारों को नौकरी से निकालने से पहले 6 माह पूर्व नोटिस देना अनिवार्य, मजीठिया वेज बोर्ड के बाद नया वेज बोर्ड अनिश्चित, अब कोर्ट जाने से पहले कंपनी की आंतरिक जांच कमेटी में करनी होगी शिकायत। यह रिपोर्ट अध्ययन पर आधारित है। भड़ास चैनल पर एमपी मिश्र की रिपोर्ट के मुताबिक:
नए श्रम कानून में पत्रकारों के लिए क्या क्या बदलाव हुआ। संक्षेप में मैं चर्चा करना चाहूंगा। पत्रकारों की परिभाषा से अब प्रबंधन और प्रशासनिक और तकनीकी कर्मचारियों को हटा दिया गया है। ग्रेच्युटी का नियम वही पुराना है। मतलब पत्रकारों को तीन साल की सेवा पूरी होने पर ग्रेच्युटी देना अनिवार्य होगा।
तीन साल की सेवा पूरी होने पर पत्रकार को नौकरी से निकालने से पूर्व 6 माह पहले नोटिस देना अनिवार्य है। या 6 माह का वेतन देना होगा। पहले यह सामान्य पत्रकारों के लिए तीन माह था और संपादक के लिए 6 माह था। अबनौकरी छोड़ने वाले (इस्तीफा देने वाले) या निकाले गए कर्मचारी को उनका अंतिम भुगतान (Full & Final Settlement) 48 घंटे (2 कार्य दिवसों) के भीतर करना अनिवार्य है। अभी तक कंपनियां इसमें विलंब करतीं थीं।
छुट्टी और कार्य समय पूर्व की भांति निर्धारित
नए कानून में पत्रकारों के काम के घंटे को पूर्व की भांति 144 घंटे मासिक रखा गया है। अर्थात प्रतिदिन 6 घंटे का काम। पर केंद्र सरकार द्वारा सरकारी अवकाश के दिन भी छुट्टी देनी होगी। ईएल (2.72), मेडिकल लीव (1.67) तो परिभाषित है पर सीएल की परिभाषा स्पष्ट नहीं है। अब कंपनी सीधे निश्चित अवधि के लिए ठेका श्रमिक रख सकती है।
नए बदलाव में अब जुर्माने के तौर पर कर्मचारी का वेतन काटना मुश्किल होगा। यदि अनुपस्थित है और उसके पास ईएल, सीएल है तो वेतन नहीं काटा जा सकता। वेतन काटने के लिए कंपनी को पहले यह मामला शिकायत निवारण समिति (GRC) के पास ले जाना होगा। उसकी सिफारिश के बाद ही वेतन काटा जा सकता है। लेकिन एक माह के वेतन का 3 प्रतिशत से ज्यादा जुर्माना नहीं लगाया जा सकता।
सबसे बड़ा सवाल मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर है। नया नेशनल वेज बोर्ड आने तक यह लागू रहेगा। सामान्यत: अधिकांश पत्रकारों से संबंधित कानून को नए कानून में शामिल किया गया है। अब नियुक्ति पत्र देना अनिवार्य होना। पुराने कानून में यह अनिवार्य नहीं था। और तब जुर्माना महज 500 से एक हजार रुपए था। अब एक लाख रुपए जुर्माना है। एक अहम बदलाव पीएफ पर हुआ है अभी तक कुछ कंपनियां इसे सीटीसी पर देती थी जो 30% के आसपास बनता अब बेसिक पर देने का नियम बनाया गया है। जो 50 % तक बनेगा।
अब सीधे श्रम न्यायालय नहीं जा सकते
अब श्रमिक किसी कानूनी उल्लंघन पर सीधे न्यायालय नहीं जा सकते। उन्हें तीन स्तरों से गुजरना होगा। पहला कंपनी की शिकायत निवारण समिति (GRC)। दूसरा श्रम विभाग का सुलह अधिकारी (Conciliation Officer) तीसरा श्रम न्यायालय । तीन-स्तरीय न्यायालय (श्रम न्यायालय, औद्योगिक न्यायाधिकरण और राष्ट्रीय न्यायाधिकरण) को खत्म कर एक-स्तरीय: सभी विवादों के लिए औद्योगिक न्यायाधिकरण में समाहित कर दिया गया है। यह दो पीठ की होगी। इसमें एक न्यायिक सदस्य और एक प्रशासनिक सदस्य (श्रम विभाग) होगा। मतलब फैसलों में तेजी की पहल की है। एक साल में फैसला देना अनिवार्य किया गया है पर सख्ती नहीं है। चूंकि कोर्ट में श्रम विभाग का अधिकारी भी रहेगा इसलिए प्रशासनिक शक्तियां अधिक दी गईं है। मतलब कानून का पालन कराने के लिए अब चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा। कोर्ट के डिजटिलाइजेशन पर जोर दिया गया है।
जीआरसी में वोटिंग से चुने जाएंगे कर्मचारियों के तीन सदस्य
चूंकि श्रम न्यायालय में फैसले का आधार कंपनी की शिकायत निवारण समिति (GRC) की सिफारिश पर निर्भर करेगा इसलिए जरूरी है कि इसके सदस्य निष्पक्ष हों। इसमें कुल 6 सदस्य होंगे जिसमें तीन प्रबंधन के और तीन कर्मचारियों के। कर्मचारी के सदस्य सामान्यत: या तो यूनियन से जुड़ें होंगे या कर्मचारियों की वोटिंग पर तय होंगे। यदि इसमें संपादक या प्रबंधन के प्रभाव वाला सदस्य होता है तो इसकी शिकायत की जा सकती है या ईमेल के माध्यम से कर्मचारी उस सदस्य पर आपत्ति व्यक्त कर सकते हैं।
अंत में सार यही कहना चाहूंगा कि कानून बनाना तो एक लुभावनी स्कीम की तरह होता है, पर इसका पालन जिसकी लाठी उसकी भैंस की तरह
है।





















