नजरिया न्यूज़ पटना। बिहार की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने और उसे जन-जन तक पहुंचाने वाले अररिया निवासी लोक कलाकार ओम प्रकाश सोनू को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धि मिलने जा रही है। अमेरिका की प्रतिष्ठित ग्लोबल यूनिवर्सिटी ऑफ बोस्टन द्वारा उन्हें लोक कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए डॉक्ट्रेट की मानद उपाधि से नवाज़ा जाएगा। यह सम्मान उन्हें 14 जून को गोवा में आयोजित एक विशेष समारोह में प्रदान किया जाएगा।
ओम प्रकाश सोनू कला की दुनिया में एक जाना-पहचाना नाम हैं। वे न केवल एक कुशल रंगकर्मी हैं बल्कि लोकनाट्य, गीत-संगीत और पारंपरिक कलाओं को मंच पर जीवंत करने में माहिर हैं। बिहार के अररिया जिले के शास्त्री नगर, वार्ड नंबर 16 निवासी ओम प्रकाश सोनू की कला यात्रा वर्ष 2005 में उस समय सुर्खियों में आई जब उन्होंने राज्य स्तरीय प्रतिभा उत्सव में नाट्य निर्देशन के लिए पुरस्कार प्राप्त किया। उस समय उनकी उम्र कम थी, लेकिन जुनून बड़ा था।
ओम प्रकाश का मानना है कि लोक कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव का सशक्त जरिया है। उन्होंने अपनी कला के जरिए समाज में जागरूकता फैलाने, सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और युवाओं को इससे जोड़ने का काम किया है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोकनाट्य और नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से उन्होंने सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।
गौरतलब है कि ग्लोबल यूनिवर्सिटी ऑफ बोस्टन विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों को हर साल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित करती है। इस बार भारत से चुने गए लोक कलाकारों में ओम प्रकाश सोनू का नाम प्रमुख है, जो बिहार के लिए गर्व की बात है।
इस सम्मान की खबर मिलते ही ओम प्रकाश सोनू के गांव और जिले में खुशी की लहर है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सम्मान न केवल ओम प्रकाश के व्यक्तिगत प्रयासों की सफलता है, बल्कि बिहार की लोक परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलने जैसा है।
ओम प्रकाश ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि यह सम्मान उन्हें और भी अधिक प्रेरणा देगा और वे आगे भी लोक कला के प्रचार-प्रसार में समर्पित रहेंगे। उन्होंने युवाओं से भी अपील की कि वे अपनी जड़ों से जुड़ें और लोक संस्कृति को आगे बढ़ाएं।
इस उपलब्धि के साथ ही ओम प्रकाश सोनू न केवल बिहार, बल्कि देश के उन अनगिनत लोक कलाकारों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गए हैं जो सीमित संसाधनों में भी अपनी कला से समाज को समृद्ध करने में जुटे हैं।























