बुलडोजर से घर जमींदोज करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में मानवाधिकार की दिखाई दिया चेहरा
=जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा है कि किसी व्यक्ति के घर या संपत्ति को सिर्फ़ इसलिए तोड़ दिया जाना कि उस पर अपराध के आरोप हैं, क़ानून के शासन के ख़िलाफ़ है
=अदालत के निर्देशों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित अधिकारियों को अपने निजी खर्च पर गिराई गई संपत्ति की पुनर्स्थापना कराएंगे
=सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ये आदेश ऐसे मामलों में लागू नहीं होंगे जहां सार्वजनिक स्थलों, जैसे कि सड़क पर कोई अवैध संरचना हो
= किसी अदालत द्वारा दिए गए विध्वंस के आदेशों पर भी यह दिशा निर्देश लागू नहीं होंगे
*दुर्केश बहादुर सिंह, संपादकीय प्रभारी नजरिया न्यूज, 13नवंबर।*ँँं
जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि किसी व्यक्ति के घर या संपत्ति को सिर्फ़ इसलिए तोड़ दिया जाना कि उस पर अपराध के आरोप हैं, क़ानून के शासन के ख़िलाफ़ है।जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने यह भी कहा है कि किसी व्यक्ति के घर या संपत्ति को सिर्फ़ इसलिए तोड़ दिया जाना कि उस पर अपराध के आरोप हैं, क़ानून के शासन के ख़िलाफ़ है। 100अपराधी भले ही सजा से बच जाएं लेकिन एक भी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का उक्त निर्णय सुप्रीम कोर्ट के ही उक्त फैसले का शत-प्रतिशत प्रतिनिधित्व कर रहा है।
बुलडोजर से घर गिराने का जिस भी अधिकारी ने निर्णय लिया हो, सुप्रीम कोर्ट का उक्त फैंसला ऐसे फैंसले पर सही मायने में इंसाफ की देवी का सदियों तक अनुकरणीय न्याय है।
उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने ये दिशा-निर्देश घरों को बुलडोज़र से तोड़े जाने के ख़िलाफ़ दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिए हैं।अपना आदेश सुनाते हुए जस्टिस गवई ने कहा, ”एक आम नागरिक के लिए घर बनाना कई सालों की मेहनत, सपनों और महत्वाकांक्षाओं का नतीजा होता है.”। मीडिया का सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी है कि कई राज्यों में प्रशासन ने ऐसे लोगों के घरों को तोड़ा है, जिन पर सरकार के ख़िलाफ़ विरोध- प्रदर्शनों में शामिल होने का शक़ था।
बता दें कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन में बुलडोज़र का महिमामंडन भी किया गया है। उनके कई समर्थक राजनीतिक रैलियों में बुलडोज़र लेकर जाते रहे।
अपना आदेश सुनाते हुए जस्टिस गवई और जस्टिस विश्वनाथन की बेंच ने कहा , ”हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अगर कार्यपालिका मनमाने ढंग से किसी नागरिक के घर को केवल इस आधार पर तोड़ देती है कि वह किसी अपराध का अभियुक्त है तो कार्यपालिका क़ानून के शासन के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ कार्य करती है.”।
”अगर कार्यपालिका न्यायाधीश के रूप में कार्य करते हुए किसी नागरिक पर केवल अभियुक्त होने के आधार पर विध्वंस का दंड लगाती है तो यह शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत का भी उल्लंघन है.”।
अदालत के निर्देशों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित अधिकारियों को अपने निजी खर्च पर गिराई गई संपत्ति की पुनर्स्थापना कराएंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ये आदेश ऐसे मामलों में लागू नहीं होंगे जहां सार्वजनिक स्थलों, जैसे कि सड़क पर कोई अवैध संरचना हो।
किसी अदालत द्वारा दिए गए विध्वंस के आदेशों पर भी यह दिशा निर्देश लागू नहीं होंगे।
इससे पहले अदालत ने अपने आदेश सुरक्षित करते हुए आश्वासन दिया था कि वह दोषी क़रार दिए गए अपराधियों की भी वैध निजी संपत्तियों की राज्य प्रायोजित दंडात्मक विध्वंस कार्रवाइयों से रक्षा करेगी।






















