*प्रतिभा सिंह, संवाददाता नजरिया न्यूज, 09नवंबर।*
सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने शुक्रवार को साल 1967 के अपने उस फ़ैसले को पलट दिया है जिसमें कहा गया था कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा हासिल नहीं हो सकता था।
सात जजों की संवैधानिक पीठ के बहुमत के फ़ैसले में एस अज़ीज़ बाशा बनाम केंद्र सरकार मामले में दिए फ़ैसले को पलटा है।
लेकिन, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा प्राप्त होगा या नहीं इसका फ़ैसला शीर्ष न्यायालय की एक रेगुलर बेंच करेगी।
इससे पांच से भी अधिक समम पहले सुप्रीम कोर्ट ने साल 1967 में फैसला दिया था कि एएमयू को अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त नहीं है, क्योंकि इसकी स्थापना कानून के ज़रिए की गई थी।
वहीं,शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने इसी फ़ैसले को पलटते हुए कुछ परीक्षण भी निर्धारित किए हैं।
अब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे पर अगली सुनवाई या फ़ैसला इन्हीं परीक्षणों को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि व्यापक तौर पर परीक्षण यह है कि संस्थान की स्थापना किसने की, क्या संस्थान का चरित्र अल्पसंख्यक है और क्या यह अल्पसंख्यकों के हित में काम करता है?
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने बहुमत का फ़ैसला सुनाते हुए कहा, “एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे का फ़ैसला वर्तमान मामले में निर्धारित परीक्षणों के आधार पर किया जाना चाहिए. इस मामले पर फ़ैसला करने के लिए एक पीठ का गठन होना चाहिए और इसके लिए मुख्य न्यायाधीश के सामने काग़ज़ात रखे जाने चाहिए”।
मुख्य न्यायाधीष ने जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा के लिए यह फैसला लिखा है।
उल्लेखनीय है कि मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व में सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। इस पीठ में उनके अलावा न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, सूर्यकांत, जेबी पारदीवाला, दीपांकर दत्ता, मनोज मिश्रा और एससी शर्मा शामिल थे।
*एक अध्ययन के मुताबिक* साल 2006 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक फ़ैसला दिया था।इस फ़ैसले में कहा गया था कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है। संविधान पीठ इसी संदर्भ में सुनवाई कर रही थी।
यही नहीं, यह मामला इससे पहले एस. अज़ीज़ बाशा बनाम भारत संघ के रूप में सुप्रीम कोर्ट में आया था। तब साल 1967 में पाँच जजों की संविधान पीठ ने इस पर फ़ैसला दिया था। इस फ़ैसले में उन्होंने कहा था कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है। इसके पीछे अलीगढ़ मुस्लिम क़ानून-1920 का हवाला दिया था।
उसका कहना था कि यह विश्वविद्यालय इसी क़ानून से संचालित होता है।न तो इसकी स्थापना मुस्लिम समुदाय ने की है और न ही वे इसे चलाते हैं। संविधान के अनुच्छेद 30 (1) के तहत अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए ये अहम शर्त है।
एएमयू की स्थापना एमएयू क़ानून-1920 के तहत हुई थी। वह इसी क़ानून से चलता है। तो एक मुद्दा यह था कि इस क़ानून से बना विश्वविद्यालय अल्पसंख्यक का दर्जा हासिल कर सकता है या नहीं।
मौजूदा संविधान पीठ ने आठ दिनों तक इस मामले की सुनवाई की।इसके बाद इस साल एक फ़रवरी को अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था। इससे पहले साल 2019 में तीन जजों की पीठ ने इस मामले को सात जजों की पीठ को भेज दिया था।
एएमयू, एएमयू ओल्ड बॉयज एसोसिएशन और हस्तक्षेपकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील डॉ. राजीव धवन, कपिल सिब्बल, सलमान ख़ुर्शीद, शादान फ़रासत पेश हुए।
सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए थे।इस मामले में इनके अलावा भी कई और वकीलों ने जिरह की थी।






















