नजरिया संवाददाता बारसोई कटिहार।
बलरामपुर विधानसभा में इस बार चुनावी परिणाम ने स्थानीय राजनीति की दशकों पुरानी धारा ही बदल दी। बताया जा रहा है कि चुनाव के अंतिम चरण में युवा मुस्लिम मतदाताओं ने ऐसा राजनीतिक ‘टर्न’ लिया, जिसकी कल्पना महबूब आलम सहित किसी ने नहीं की थी। पिछले दस वर्षों से लगातार इस क्षेत्र में दबदबा बनाए हुए विधायक महबूब आलम को युवाओं ने सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। गौरतलब है कि यहां के युवा मतदाताओं ने न तो महागठबंधन की अपील पर ध्यान दिया, बुढ़े बुज़ुर्गों की सुनी और न ही किसी परंपरागत राजनीतिक समीकरण को महत्व दिया। वे केवल परिवर्तन की इच्छा लेकर मतदान केंद्रों तक पहुँचे। पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार कई एशियाई देशों में युवाओं ने बवाल खड़ा करते हुए राजनीतिक परिवर्तन की लहर पैदा कर दी और सबकुछ उलट-पुलट कर दिया उसी तर्ज पर बलरामपुर के युवाओं ने भी अपने वोट की ताकत से महबूब आलम के किले को ध्वस्त कर दिया।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, एमआईएम प्रत्याशी आदिल हसन का दूसरे नंबर पर आना महज इत्तफाक नहीं था, बल्कि यह पिछले कुछ वर्षों की उनकी रणनीति और तैयारी का नतीजा बताया जा रहा है। खासकर कोरोना काल के दौरान जब हजारों परदेशी मजदूर और युवा मुश्किल में थे और परदेश में फंस गए थे, फैक्ट्री और गोदाम में रह रहे लोगों के सामने भूखे मरने की नौबत आ गई थी कोई भी उनकी मदद नहीं कर रहा था। पैसे होने के बावजूद भी लॉकडाउन में सारा बाजार बंद रहता था जिससे खाना पीना मुश्किल हो गया था। , तब आदिल हसन और एमआईएम संगठन ने लगातार मदद का हाथ बढ़ाया। परदेश में काम करने वाले युवाओं के साथ उनका यह सीधा जुड़ाव उन्हें एक मजबूत राजनीतिक पहचान दी।
इसके बाद से एमआईएम और आदिल हसन लगातार हैदराबाद, मुंबई, दिल्ली, पंजाब सहित अन्य राज्यों में काम कर रहे बलरामपुर के युवाओं के संपर्क में रहे। वे फोन, सोशल मीडिया और आपसी नेटवर्क के जरिए युवाओं से अपने लिए समर्थन की अपील करते रहे और उन्हें ‘परिवर्तन’ का संदेश देते रहे। बताया जाता है कि मतदान के अंतिम समय में भारी संख्या में परदेशी युवा अपने घर लौटे और उन्होंने अपनी नाराजगी तथा बदलाव की चाहत को वोट के माध्यम से व्यक्त किया। परिणाम स्वरूप परिवर्तन की यह तेज आंधी महबूब आलम के गढ़ को पूरी तरह हिला गई और उनका दशक पुराना किला ढह गया।बलरामपुर के इस नतीजे ने साबित कर दिया कि युवा मतदाता अब किसी राजनीतिक गठबंधन या परंपरागत समीकरण से बंधे नहीं हैं। वे अपनी समझ, अनुभव और भविष्य की उम्मीदों के आधार पर निर्णय लेते हैं और जब ठान लेते हैं, तो राजनीतिक तस्वीर बदलने में उन्हें देर नहीं लगती।























