पटना: तस्वीर में दिख रहे दोनों दंपती अररिया जिले के रहने वाले हैं. वंदना देवी और विश्वनाथ मिश्र दोनों प्रयागराज महाकुंभ से लौट रहे हैं, जहां पूरे एक महीने 5 दिनों तक कल्पवास में थे. कल्पवास एक ऐसा साधना है, जिसका उल्लेख पुराणों में किया गया है. यह साधना भगवान से जोड़ने का रास्ता सिखाती है.
नजरिया न्यूज़ से बातचीत में दंपती ने कल्पवास के अनुभव को साझा किया. वंदना देवी बताती हैं कि “कल्पवास के दौरान वे लोग संगम किनारे टेंट में जमीन पर सोते थे. खुद से खाना बनाकर खाते थे. कहा कि टेंट में पूरी व्यवस्था की गयी थी. किसी प्रकार की कोई दिकक्तों का सामना नहीं करना पड़ा.”
प्रयागराज से पहुंचे पटना: इस ठंड में वंदना देवी रोज सुबह में संगम में स्नान करती थी. इस कारण इन्हें सर्दी भी हो गयी. नजरिया न्यूज़ से बातचीत में बीच बीच में खांस भी रही थी. इनके साथ पति विश्वनाथ मिश्रा भी रहे. दोनों दंपती प्रयागराज से लौटने के बाद पटना जंक्शन परिसर में बने टेंट में आराम कर रहे थे.
एक महीने 5 दिनों का कल्पवास: विश्वनाथ मिश्रा ने बातचीत में बताया कि कल्पवास कितना कठिन होता है. उन्होंने बताया कि अररिया से प्रयागराज 12 जनवरी को पहुंचे थे. 16 फरवरी तक टेंट में कल्पवास धारण किए हुए थे. पूरे एक महीने 5 दिनों तक कल्पवास में रहे. विश्वनाथ मिश्रा ने कई नियम बताये जिसका कल्पवास के दौरान पालन किया जाता है.
“भूमिशयन यानी भूमि पर सोना, प्रात: कालीन स्नान यानि सूर्योदय से पहले संगम में स्नान करते थे. भगवान का भजन करने के बाद सात्विक भोजन यानि खुद से बनाकर एक टाइम खाना है. इसमें बाहर का कुछ नहीं खाना होता है. ठंड लगने के बावजूद आग नहीं तापना है. कई सारे नियम हैं जो अपनाए जाते हैं.” -विश्वनाथ मिश्र, अररिया निवासी
कल्पवास क्या होता है?: कल्पवास एक धार्मिक और अध्यात्मिक अवधारणा है. यह विशेषकर कुंभ मेला और अन्य पूजा आयोजन से जुड़ा है. एक निर्धारित समय के लिए भक्त को नियम पूर्वक साधना करना होता है. इसके लिए समय और स्थान निर्धारित होता है. यह अक्सर 40 दिनों का होता है.
कौन कर सकता है? इस साधना को कोई भी कर सकता है. यह विशेष रूप से धार्मिक उद्देश्यों से किया जाता है. ज्यादातर इसे साधु या फिर बुजुर्ग लोग करते हैं, जिन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली है. जो लोग आत्मिक शांति, मानसिक शुद्धता, और भगवान के प्रति भक्ति प्राप्त करना चाहते हैं वे कल्पवास कर सकते हैं.
कल्पवास के नियम: इसको लेकर कई नियम बनाए गए हैं, जिसे एक साधक को मानना होता है. इसका उद्देश्य मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक शुद्धता को बनाए रखने के लिए बनाया गया है जो इस प्रकार है-
- पवित्र नदी में स्नान: शारीरिक और मानसिक शुद्धता के लिए स्नान जरूरी है. प्रत्येक दिन सूर्योदय से पहले पवित्र नदी में स्नान करना है. कुंभ के अवसर पर लोग संगम में स्नान करते हैं.
- साधना और ध्यान: साधक को प्रतिदिन पूजा-पाठ करना चाहिए. भगवान को ध्यान किया जाता है. इसके लिए मानसिक शांति जरूरी है.
- मौन व्रत: कुछ लोग मौन व्रत रखते हैं. किसी भी प्रकार के विवादित बातों से दूर रहना चाहिए. इस दौरान लड़ाई झगड़ा से बचना चाहिए.
- नियत स्थान: इसमें स्थान भी महत्वपूर्ण होता है. साधक को एक ही जगह कैंप बनाकर रहना होता है. जमीन पर सोना होता है.
- ब्राह्मचर्य का पालन: इस दौरान भक्त को ब्राह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है. भोग विलास और सांसारिक मोह से दूर रहें. इससे शारीरिक शुद्धता मिलती है.
- सात्विक आहार: साधना के दौरान भक्त को सात्विक भोजन करना चाहिए. यानि शुद्ध शाकाहारी होना चाहिए. इसमें घर से बाहर का कुछ भी नहीं खाना चाहिए. फल, दूध, सब्ज़िया, दाल का सेवन करना चाहिए. मांसाहार, शराब, और अन्य तामसिक आहार से बचना जरूरी माना जाता है.
किस भगवान की होती है पूजा?: कल्वपास में अलग-अलग भगवान की पूजा होती है. इसके आयोजन पर निर्भर करता है. कुंभ मेला में मुख्यत: भगवान शिव की पूजा होती है. इसके अलावे भगवान विष्णु, श्रीराम, श्रीकृष्ण, मां गंगा, मां दुर्गा, हनुमान जी, लक्ष्मी माता की पूजा की जाती है.























