क्या 1951में जमींदारी उन्मूलन कानून से जमींदारों को हुई क्षति से राहत दिलाना था चकबंदी कानून 1953 का उद्देश्य
= सुल्तानपुर जिले के कादीपुर तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत पाकरपुर में 1980के दशक से चल रही है चकबंदी में पैसे वाले के पक्ष में हुआ है खेल
= हाईकोर्ट द्वारा चकबंदी पर स्टे लगाने और नये सिरे से चकबंदी करने के आदेश का भी गरीब काश्तकारों को नहीं मिला न्याय
= अंश निर्धारण व बाग पर मालियत लगवाने में आधुनिक जमींदार फिर हो गए सफल
अनिल उपाध्याय,विशेष संवाददाता नजरिया न्यूज ।
एक हरिजन जमींदार की बाग में घर बनाकर रहता है। जमीदार द्वारा उक्त भूमि पैसेवाले जमींदार को बेंच दी गई। पैसेवाले जमींदार ने उस जमीन पर मालियत लगवाया और जमीन अनुसूचित जाति के खाते में जाने से बचा लिया।
वहीं एक काश्तकार अपनी जमीन से सड़क जाने दी। काश्तकार गरीब था। उस जमीन पर सड़क दर्ज करके उक्त खाते से उतनी जमीन चकबंदी विभाग ने कम कर दी।
एक काश्तकार गरीब था। उसकी बाग में एक रैयत बसा हुआ था। चकबंदी विभाग ने लिखा “मौके पर घर-द्वार पाया गया। ऐसा इसलिए लिखा गया गया कि काश्तकार गरीब था। चकबंदी विभाग चाहता तो जमींदार की तरह उस बाग पर मालियत लग जाती। रैयत को आबादी मिल जाती और गरीब काश्तकार को मालियत। हमेशा के लिए विवाद समाप्त हो जाता। लेकिन गरीबों को सरकार की तरफ आबादी नहीं दी गई। गरीब काश्तकार की बाग पर कब्जा भी लिख दिया गया। गरीब-गरीब लड़ते रहे।
ग्रामीणों ने कहा : दरअसल जिस बाग पर मालियत लगाई गई। उस बाग में अनुसूचित जाति का घर-द्वार था। जिसकी जमीन थी, वह पहुंच वाले थे। इसलिए उस बाग पर मालियत लगाकर बड़े आदमी को उसके बदले चकबंदी विभाग ने जमीन एलाटमेंट कर दी। वहीं दूसरा काश्तकार गरीब था। इसलिए उसकी बाग पर चकबंदी विभाग मालियत नहीं लगाकर लिख दिया कि मौके पर आबादी पाई गई।
इसी प्रकार गरीब काश्तकार अपनी जमीन पर सड़क बनने दिया। अब काश्तकार की जमीन सड़क की हो गई है। वहीं अमीर काश्तकारों को राहत प्रदान की गई।




















